बेहद सरल, मगर असाधारण व्यक्त्वि की धनी थी कै. राजमाता विजयाराजे सिंधिया

व्ही.एस.भुल्ले। सन 1919 ई. म.प्र. के सागर में आज ही के दिन जिला जालौन के डिप्टी कलेक्टर महेन्द्र सिंह ठाकुर राणा परिवार में जन्मी कै.राजमाता विजयाराजे सिंधिया भाग्य से तो सौभाग्यशाली थी ही जिनका विवाह उस समय की सबसे वैभवशाली बड़ी रियासी सिंधिया स्टेट के महाराज जीवाजी राव सिंधिया से 21 फरवरी 1941 ई. में हुआ। 

मगर उन्होंने इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजमाता से लेाकमाता का ओहदा 1962 में अपने पति स्व. महाराज जीवाजीराव सिंधिया की मृत्यु उपरान्त कर्मो के आधार भर हासिल हुआ। यूं तो उनकी 4 पुत्रियाँ, स्व. पदमा राजे तथा ऊषा राजे, वसुन्धरा राजे मु यमंत्री राजस्थान, श्रीमंत यसोधरा राजे सिंधिया मंत्री म.प्र. शासन एवं उनके इकलौते पुत्र स्व. कै. माधवराव सिंधिया जो पूर्व केन्द्रीय मंत्री थे और उनके नाती के रुप में शिवपुरी गुना-सांसद पूर्व केन्द्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया है। जिन्होंने अपने कर्मो के आधार पर ही उनसे प्राप्त संस्कारों की छत्र-छाया में सिंधिया परिवार का वैभव बढ़ाया। मगर सरल, अतिसंवेदनशील स्व. राजमाता विजयाराजे सिंधिया मूल्य सिद्धान्त, संस्कारों की सार्वजनिक जीवन में स त पक्षधर थी। और उन्होंने अपने बच्चों की परिवरिश व जनसेवा के माध्ययम से यह साबित भी किया कि जितना अगाध स्नेह उन्हें ईश्वर की आस्था में था उतना ही स्नेह वह आम जनता से भी रखती थी जितनी चिन्ता वह स्वयं के परिवार की रखती थी उतनी ही चिन्ता वह आम कार्यकर्ता व क्षेत्र के लोगों की भी रखती थी। अन्नबैक गांव-गांव में हो यह सपना उन्होंने शिवपुरी कोर्ट रोड़ पर आयोजित सभा में व्यक्त किया। 

तत्काल न्याय, समस्या, समाधान में विश्वास रखने वाली राजमाता एक मर्तवा शिवपुरी सर्किट हाउस पर हरीसिंह डकैत से प्रताडि़त लोगों को देख इतनी व्यथित हो उठी कि उन्होंने मौके पर मौजूद पुलिस अधीक्षक से कहा कि जब महाराज थे। तब वह डकैतों से लोगों की रक्षा के लिये स्वयं जंगलों में कै प करते थे। इतना ही नहीं जनता के स्वाभिमान व स मान की खातिर स्व. इन्दिरा गांधी जैसी सशक्त प्रधानमंत्री महिला से सीधे जा भिड़ी और बरेली से चुनाव लड़ा तथा इमरजेन्सी के दौरान सारा वैभव महल छोड़, जेल में रहने वाली राजमाता ने जमानत तक नहीं ली, जब लोग अयोध्या प्रकरण में मुंह छिपते घूम रहे थे तब अपने भगवान राम में सार्वजनिक तौर पर आस्था व्यक्त करने वाली वह राजमाता सिंधिया ही थी। 

उनका समुचा जीवन जनसेवा के माध्ययम से लोगों को कुछ न कुछ देना ही रहा, यहां तक कि जो योगदान तन, मन, धन से भाजपा से रहा। मगर समुचे जीवन उन्हें न तो उस राजवंश जहां सौहरत दौलत अपार थी उसके उपभोग न ही देश में भाजपा की अटल सरकार के रहते किसी पद प्रतिष्ठा की इच्छा रखी, बल्कि अटल बिहारी, आडवाणी, सुश्री उमा भारती से लेकर सुषमा स्वराज के अलावा कई ऐसे नेता दिये जिनका राजनैतिक या फिर सार्वजनिक जीवन में लोहा माना जाता है। कहावतों या सुनी, सुनाई माने तो ग्वालियर में हुये छात्र आन्दोलन में हुई छात्रों की मौंते से वह इतनी व्यथित हुई कि वह तब तक ग्वालियर नहीं लौटी, जब तक कि देाषियों पर कार्यवाही नहीं हो गई। 

बहरहाल जो भी हो, ऐसे में ऐसे ही जीवन, वैभवशाली अतिसंवेदनशील व्यक्त्वि जब तब ऐसा जीवन जी पाते है, जिसे समाज में एक स मानित स्थान प्राप्त होता है, जो स्थान आज राजमाता विजयाराजे सिंधिया का देश में है। वह बिरले ही पाते है, मगर अफसोस कि जिस दल को खड़ा कर, वैभवशाली बनाने में उन्होंने समुचा जीवन खपा दिया आज उस दल की केन्द्र व राज्य में सरकार होने के बावजूद भी उनके जन्मदिन पर जनता के अलावा उनकी याद में कोई शासकीय विज्ञापन नहीं छप सका, शायद हमारे देश ही नहीं समाज की यह हकीकत है कि जो लोग देश व समाज और मानवता के लिये एक संत की तरह त्याग तपस्या पूर्ण जीवन जीते है शायद उनकी नियति यहीं हो। 
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