राहुल चाहें तो कर सकती है कांग्रेस, उप्र में बेहतर प्रदर्शन

व्ही.एस.भुल्ले। किसी भी प्रदेश में सत्ता प्राप्ति के पीछे दलो की प्रष्ठ भूमि, नेताओं का आचरण, व्यवहार तथा जनता का वोट अहम होता है न कि बाजारु तकनीक और रणनीति। देखा जाये तो सरकार बनाने या बिगाडऩे में जो तकनीक होती है उसमें किसी भी दल के चन्द नेता या हजारों क्षेत्रीय नेता तथा कार्यकत्र्ताओं का सामूहिक समझ और समन्वय होता है जो जनता से जुड़े मुद्दों को लेेकर जनता के बीच जाते है और उनका विभिन्न माध्ययमों से प्रचार-प्रसार कर रणनीति अनुसार योजना का क्रियान्वयन कर सत्ता प्राप्ति कर जाते है। क्योंकि किसी भी दल की सरकार बनाने में आम जनता के वोट का अहम रोल होता है जिसके पक्ष में भी मतदान हो जाता है सत्ता और सरकार भी उसी दल की बन जाती है। जिसकी स पूर्ण सफलता  किसी भी दल के चन्द प्रमुख नेता, सेकड़ों की तादाद में शहर कस्बों में मौजूद नेताओं की मेहनत और दल द्वारा तैयार रणनीति पर निर्भर करती है। जबकि सारा दारोमदार जनता के वोट पर निर्भर करता है, जिसे मत पेटियों तक पहुंचाने व पक्ष में माहौल बनाने में कार्यकत्र्ताओं की जरुरत होती है, बात सिर्फ इतनी सी है काश राहुल और शेष कॉग्रेस समझ पाये। 

क्योंकि जिस तरह से राहुल ने जान का जोखिम उठा राजनैतिक रुप से खूंखार उ.प्र. में मृत प्राय कॉग्रेस में जान फूकने की कवायद 26 दिन हजारों कि.मी. की यात्रा कर खाट सभा के माध्ययम से की है तथा अकेले ही जो हुंकार राष्ट्र व नैतिकता की खातिर भाजपा को सरेयाम ललकार कर भरी है। खासकर जब उ.प्र. की राजनीति में राजनैतिक ध्रुर्वीकरण का दौर चल रहा हो, ऐसे में कॉग्रेस को मुनासिफ समय है कि वह पूरा एड़ी चोटी का जोर लगा, कॉग्रेस के जीत अभियान में जुट जाये। 

भले ही कुछ लोगों का यह तर्क देते हो कि कॉग्रेस की हालत उ.प्र. में बड़ी खराब है वह यह भी तर्क देते है कि स्वयं राहुल ने यात्रा के दौरान देखा है कि सभाओं में भीड़ नहीं जुटती, हो सकता है यह सच भी हो। मगर यह स पूर्ण सत्य नही, क्योकि कहावत है कि कभी कभी आंखो से देखा व कानों से सुना, सच भी झूठ निकल जाता है। ऐसे में केवल एक ही सच बचता है जिसे हम अनुभूति, एहसास, मेहसूस होना भी कहते है जो आम वोटर के अन्दर कॉग्रेस के प्रति होना आवश्यक है। किसी भी अभिनेता, विद्ववान, महान व्यक्ति की जुबान फिसल सकती है उसका प्रचार दुष्प्रचार भी हो सकता है, मगर सत्य कभी झूठ साबित नहीं हो सकता। और सत्य है कि राहुल एक ईमानदार एवं नेक दिल इन्सान है तथा कॉग्रेस भारतीय स यता, संस्कृति का प्रतीक है, जिसका सारा दारोमदार फिलहाल पार्टी संचालन व कार्यकत्ताओं की  शक्ति पर निर्भर करता है। ऐसे में कॉग्रेस का कार्य व्यवहार, बॉडी लेंग्यूज, भाषा एवं जब तक जनता के बीच भारतीय स यता, संस्कृति का अगुवा बन, लोकप्रियता एवं जन कल्याण, राष्ट्र कल्याण, एकता अखण्डता, सहष्णुता का प्रभाव नहीं छोड़ता तब तक कॉग्रेस को नुकसान पहुंचाने वाले लोग दिन व दिन ताकतवर और विपक्षी आक्रमक बने रहेगें। 

क्योंकि राजनीति में तकनीक निर्जीव मगर सहायक हो सकते है, मगर राजनीति हमेशा जीवन्त होती है। आज जब लाख प्रयासों के बावजूद भाजपा अपना टे पों उ.प्र. में नहीं बना पा रही है, वहीं जाति आधारित राजनीति की इन्जीनियरिंग से जीवंत और स्वस्थ राजनीति से हलाक ब.स.पा. छटपटा रही है। वहीं स.पा. में बर्चस्व को लेकर सरफुटब्बल मची है ऐसे में 10 वर्ष तक केन्द्र में शासन करने वाली कॉग्रेस कमजोर कैसे हो सकती है। जरुरत है बेहतर समझ, स्पष्ट मुद्दे और कारगार रणनीति की है। अगर कॉग्रेस इस दिशा में बढ़ पायी तो कोई कारण नहीं जो राहुल के नेतृत्व में कॉग्रेस का वैभव उ.प्र. में न लौट पाये, जरुरत है, उत्साह के साथ कॉग्रेस और राहुल को बगैर किसी टीका टिप्पणी पर ध्यान दें, उत्तरप्रदेश में कॉग्रेस के लिये एक नई शुरुआत की, जो कॉग्रेस को एक नया जीवन प्रदान कर सके।  
SHARE
    Your Comment

0 comments:

Post a Comment