कर्तव्य विमुखता की पराकाष्ठा और वैबस मप्र शासन

शिवपुरी। शिवपुरी प्रदेश ही नहीं शायद देश का पहला ऐसा शहर है, जहां कर्तव्य विमुखता के आगे समुचा मप्र शासन बैवस नजर आता है। बैठकों पर बैठकें आला अफसर, माई बापों के दौरे और हलाकान जनता ये नहीं समझ पा रही कि आखिर उसका क्या अपराध है, जो कत्र्तव्य विमुख अधिकारी, कर्मचारियों की समुची फौज इस सुन्दर शहर को ठिये ठिकाने लगाने में लगी है। 

अगर खबरों की माने तो नगरपालिका जैसी सेवा भावी संस्था अपने मु य कार्य, साफ सफाई, पेयजल, बिजली, व्यवस्था के नाम अब लूट के अड्डे में तब्दील हो चुकी है। विकास और जन सुविधा के नाम जिस तरह से गरीब जनता को लूट छकाया जा रहा है वह किसी से छिपा नहीं, मगर शासन और सरकार की छत्र-छाया में यह सब कुछ विगत वर्षो से अनवरत चल रहा है। 
जिसका फिलहाल कोई अन्त नजर नहीं आता है। ढाई लाख के लगभग जनसं या वाले इस शहर में आज एक भी साफ सुथरा मूत्रालय नहीं, जहां नियमित साफ सफाई होती हो। समुचे देश में स्वच्छता अभियान चल रहा है, तब इस शहर के बाथरुम गन्दगी से पटे पड़े है फिर चाहे वह कलेक्टर कार्यालय हो या फिर पुलिस अधीक्षक कार्यालय स्वयं नगर पालिका कार्यालय तक के बाथरुमों में दुर्गन्ध दौलती नजर आती है। 

ये तो आम नागरिकों की अहम समस्याओं कि बानगी भर है जिसमें शहर को गन्दगी मुक्त, सुविधा युक्त बनाने वाली सीवर लाइन योजना के अनियंत्रित मनमाने ढंग से किये गये निर्माण कार्य और मूर्खता पूर्ण डी.पी.आर. ने शहर की सडक़ें ही नहीं उसकी सुन्दरता का सत्यानाश कर लोगों को बिलबिलाने पर मजबूर कर दिया।  मजे की बात तो यह है कि इस योजना को गर्त में धकेलने वाला प्रोजक्ट मैनेजर शुरु से ही डी.पी.आर. को भगवान मान पूरी निष्ठा से निभाने में लगा रहा, बड़े पैमाने पर कमीशन के लालच में सरेयाम सुन्दर शहर को चौपट करने वाला वहीं प्रोजक्ट मैनेजर आज भी अपने पद पर ताल ठोकके जमा हुआ है। जिसके खिलाफ  आज तक न तो शासन,  न ही सरकार और न ही अफसरों के दौरे कुछ कर पाये। हालात ये है उसके खिलाफ कार्यवाही तो दूर उसका बाल बांका तक कोई माई का लाल नहीं कर पाया, और न ही शासन उससे वह सवाल कर पाया, जो आज भी अनुत्तरित है।

ऐसा ही हाल सिन्ध पेयजल से जुड़ी योजना का रहा, वर्षो से धक्के खाती यह योजना अभी भी जहां कि तहां खड़ी है। और हर वर्ष पेयजल परिवहन के नाम करोड़ोंं के व्यापार का प्रचलन इस शहर में पेयजल के नाम चल निकला । इतना ही नहीं जि मेदारो पर कार्यवाही तो दूर उनसे सवाल तक शासन नहीं कर पा रहा। रहा सवाल शहर को रात में रोशन करने वाली स्ट्रीट लाइट तो करोड़ों की लाइटें खरीदी के चलते अब यह लूट का व्यवसाय बन चुका है जहां घटिया लाइटें जमकर खरीदी बैची जा रही है। 

जिसमें सबसे बत्तर हालत तो पी.डब्लू.डी की सडक़ों की है रोड़ तो बन न सकी, बनी बनाई रोड़ भी बनने के साथ ही धरासायी हो गयी। बड़ा हल्ला हुआ मंत्रियों से लेकर आला अफसरों ने दौरे किये, मगर एक सबइन्जीनियर को छोड़ किसी के विरुद्ध कोई कार्यवाहीं नहीं हो सकी। और पी.डब्लू.डी के अफसरान झूठ पर झूठ बोलते नहीं थकते। हद तो तब है जब सडक़ों की हालात सुधारने बुलाई बैठक में हास्यपद तर्क दे, सडक़ें सुधारने के फारमूले सुझाये गये। 

इससे साफ है कि म.प्र. शासन की समुची मशीनरी शिवपुरी के नाम कत्र्तव्य विमुख हो चुकी है। न तो किसी पर कोई प्लान है, न ही कोई योजना, बस बैठके और बैठकों में होता जबानी जमा खर्च जहां जि मेदार अपने वरिष्ठ अधिकारी या मंत्रियों को झूठे आश्वासन और भ्रामक जानकारी परोस अपने कत्र्तव्यों की इतश्री करने में लगे रहते है। 

अगर काम किया जाता और लोग अपने कत्र्तव्य समझते तो उल्टी सीधी नाली ऊबड़-खाबड़ सी.सी. सडक़े और बीच सडक़ों पर बोर व शहर के बीचों बीच झूलते खतरनाक 11 केवी के असुरक्षित तार नहीं होते, न ही शहर के नाले, मूत्रालय सडक़े गन्दगी से पटे होते। बल्कि नहाने के पानी से भी बत्तर पानी लोग नहीं पी रहे होते। क्योंकि जि मेदारों को लूटपाट से इतर योजना बनाने की फुरसत ही कहां, जो वह इस अभागे शहर के बारे में सोच सके।  अब तो भगवान भरोसे ही इस शहर का भविष्य है, देखना होगा आखिर और कितने दिन शहर वासियों को और कितने दिन ऐसे दुर-दिनों के रुप में देखने होगें। 
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