राहुल ने कुछ गलत नहीं कहा...?

व्ही.एस. भुल्ले। विविधता से भरे देश में भाषाई शब्दों की सामाजिक स्वीकार्यता या स्वीकार्यता क्षेत्रीय आधार पर हो सकती है, मगर खून की दलाली जैसा शब्द इतना अक्ष य अपराध कैसे हो सकता है। जबकि राजनीति, कविता, आलेख, लेख या खबरों में कई प्रकार के व्यंगात्मक एवं स्थानीय भाषाई शब्दों का खुलेयाम उपयोग होता हो। फिर भी जो व्यक्ति दो दिन पूर्व किसी व्यक्ति के साहसिक कार्य की देश की खातिर प्रसंशा करता हो, वह कैसे किसी भी प्रकार की अस मानजनक भाषा का इस्तमाल कर सकता है। 

देश के सबसे बड़े दल को लीड करने वाले नेता से इतनी बड़ी चूक कैसे हो सकती है, जिसे विपक्षी दल अपमानजनक ठहरा रहे है। भले ही जिस राजनैतिक रुप से खूंखार प्रदेश में राहुल ने पूरे 26 दिनों तक 2400 किलोमीटर की यात्रा पूरी की हो, उस मौके पर उनके जरा से व्यान पर तूल खड़ा कर देना, विपक्षी दल का राजनैतिक द्वेश तो हो सकता है, मगर सकारात्मक राजनीति नहीं।

आज जिस तरह से कॉग्रेस को छोड़, कॉग्रेस की एक वरिष्ठ नेता भाजपा में शामिल हो अर्दसत्य बोल राहुल और पीके को निशाना बनाते दिखी, उसे देखकर तो यहीं कहा जा सकता है कि उनका दर्द राहुल से कम पीके के प्रति कुछ अधिक रहा। और यह सौभाविक प्रक्रिया भी है जो तर्क उन्होंने पीके को लेकर प्रस्तुत किया वह स पूर्ण सत्य हो सकता है, मगर राहुल के व्यान को लेकर जो अनुभव उन्होंंने जाहिर किया वह सत्य नहीं। 

इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए कि राहुल उस परिवार केे चश्मो चिराग है जिसकी कई पीढिय़ाँ आजादी के पूर्व से लेकर आज तक कई प्रकार की कुर्बानियाँ देता आ रहा है। आखिर जिस खून में ही देश भक्ति दौड़ती हो वह कैसे कोई ऐसा शब्द बोल सकता है। छोड़ वर्तमान राजनैतिक परिवेश को लेकर जिससे देश व देश के किसी स मानित व्यक्ति का अपमान होता हो। और उस समय दिया गया उनका व्यान हो सकता है, राजनैतिक हो। हम यह कैसे ाूल सकते है कि सोशल मीडिया सहित सार्वजनिक मंचो से स मानित को विरुद्ध कैसे-कैसे आरोप-प्रत्यारोप लगा एवं घटिया भाषा का इस्तमाल राजनैतिक स्वार्थ पूर्ति एवं सत्ता हासिल करने के लिये होता रहा है। देश में ऐसे नेताओं की एक ल बी फैस्रित मौजूद है। मगर उन पर न तो सत्ताधारी दल और न ही विपक्ष सहित राहुल पर आरोप लगाने वाले नहीं बोलना चाहते। जो लोग महात्मा गांधी से लेकर पण्डित जवाहर लाल नेहरु तक को टीका टिप्पणी करने से नहीं चूकते, जो लोग 70 वर्षो तक कॉग्रेस को कोसते-कोसते नहीं थके, जो लोग सत्ता को माई बाप समझ स्वार्थो के अथाय सागर में डूबे हो, जो लोग यह चाहते हो कि राहुल कॉग्रेस का नेतृत्व न करे ऐसे लोग सच कैसे बोल सकते है। जिस देश में खड़ाऊं शासन सर्वोत्तम चला हो तो राहुल तो इन्सान है आखिर वह ऐसी महान पार्टी को उस पार्टी के महान नेताओं सिपहसालार, सलाहकार के रहते क्यों नहीं चला सकते। जिस देश में अपने-अपने हितों का साध 10 वर्ष तक संगठित सरकार चली हो  जब राहुल चाहते तो कुछ भी बन सकते थे। मगर उन्होंने कर्म भूमि अपनी मातृ भूमि की सेवा को चुना। ऐसे भोले भाले व्यक्ति पर राजनैतिक रुप से इस तरह के आरोप-प्रत्यारोप स्वस्थ राजनीति के समदर्शक नहीं हो सकते। और न ही ऐसे वो लोग जो जरा-जरा सी बातों पर पार्टी के अन्दर ही इस तरह के मुद्दें उठा सवाल खड़े करते हो। क्योंकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जो भी संगठन होते हो, उनमें भी लोकतंत्र का बने रहना भी तो कोई चीज होती है। 

इसमें ऐसा खास क्या, जो जब तब पार्टी के अन्दर ही राहुल को लेकर सवाल खड़े होने लगते है। यह विपक्ष का राजनैतिक रणकौशल और रणनीति ही है जो वह राहुल की बढ़ते कदमों को रोकने में कामयाब होजाता है। 
SHARE
    Your Comment

0 comments:

Post a Comment