संगठित मानवता से होगा, आतंक का अन्त: बुराईयों के वध में उत्तम चाल चरित्र अहम

व्ही.एस.भुल्ले। आज जिस तरह से हमारे महान भारत ही नहीं समुचे विश्व में अराजकता का वातावरण विभिन्न विषयों को लेकर बना हुआ है वह अब प्रताडि़त मानव स यता, मानवता के लिये एक बड़ा खतरा बन गया है। और अब इसका अन्त सिर्फ और सिर्फ संगठित मानवता ही कर सकती है जिसके लिये आवश्यक है। हमारा उत्तम चाल चरित्र और सोच जैसा कि महात्मा गांधी भी कहा करते थे। कि उत्तम साध्य की प्राप्ति के लिये उत्तम संसाधनों का होना जरुरी है। 

लखनऊ के रामलीला मंच से देश को स बोधित करते हुये देश के प्रधानमंत्री भी कह चुके है कि संगठित मानवतावादी शक्तियों को आतंक के अन्त के लिये एक होना जरुरी है । वह दशहरे के शुभ अवसर पर रामलीला, रामचरित्र मानस के उस अध्याय की चर्चा करने से भी नहीं चूके जिसमें माता सीता को बिलखते देख, जटायू नाम का पक्षी भी रावण जैसे अताताई महाशक्तिशाली से भिड़ गया, केवल मातृ रक्षा के लिये। 

तात्पर्य निश्चित ही आतंक या बुराई ताकतवर, शक्तिशाली हो सकती है अगर मानवता के नाते अपनी शक्ति अनुसार सामना किया जाये तो एक न एक दिन उस अताताई को नियति के सहारे परास्त होना पड़ता है। जिसकी कीमत रावण को भी त्रिलोक विजयी, प्रखण्ड विद्ववान होने के बावजूद समूल कुल के विनाश के साथ अहंकार बस चुकानी पढ़ी। 

ये बात लगभग 7000 वर्ष पुरानी हो सकती है इसके बाद न्याय, अन्याय को लेकर लगभग 5000 वर्ष पूर्ण का भी कंष, भगवान कृष्ण महाभारत जैसे महान ग्रन्थ हमारे बीच है। 2500 वर्ष पूर्व बुद्ध और 1800, 500, 200 वर्ष के ग्रन्थ है। मगर आज भी हम अगर आतंक, अत्याचार, व्याभिचार, अन्याय से जूझ रहे है तो इसका मतलब साफ है कि मानवता, इन्सानियत असंगिठत हो, कत्र्तव्य विमुख पढ़ी है, कारण न तो हम अपने बीच वह चाल, चरित्र, मर्यादा ही रख पाये जिस पर मानवता फलती फूलती है। हमने नये लक्ष्य तय कर एक ऐसे समाज का निर्माण कर लिया जहां सिर्फ आतंक, अन्याय, अत्याचार दिखाई देता है, जिसकी इजाजत प्रकृति भी नहीं देती। 

लोगों के जीवन जीने के तरीके अनेक हो सकते, मगर सबका लक्ष्य एक है शान्ति समृद्धि और खुशहाली जिसमें रह मानवता प्रकृति अनुकूल विचरण कर सकती है, यहीं सभी विधाओं को सार और अन्तिम लक्ष्य होना चाहिए।  
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