औचित्यहीन बयानों पर बिलखते दल, महान देश की महान जनता को मुंह चिड़ाते लोग

व्ही.एस.भुल्ले। इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए कि लोकतंत्र में जनता ही सर्वोपरि होती है जनता ही सरकारें बनाती है और बिगाड़ती भी है। जिसके चलते देश व देश की जनता के प्रति किये गये सेवा भावी प्रदर्शन के आधार पर जनता पुन: वोट दें, लोगों को सत्ता तक पहुंचाती है। मगर जब से धन, बल के आधार पर लोकतंत्र के चारो स्त बों में लगभग एकता का भाव पैदा हुआ है, तब से जनता को बिसार दलो ने अपने-अपने एजेन्डे चला देश की महान जनता को दर्शकों की भूमिका में ला, बिलबिलाने पर मजबूर कर दिया है। 

अब इसे हमारे महान लोकतंत्र और इसकी जनता का सौभाग्य कहे या र्दुभाग्य कि उसे अब लगभग 5 वर्षो तक लोकसभा, विधानसभा, पंचायत, नगरीय निकायें इत्यादि चुनावों मेंं ही व्यस्थ रहना पड़ता है। हर दिन नित नये मुद्दे और दलो के गैर जरुरी व्यानों पर बहस खासकर उन मुद्दों को छोड़ जो देश की गरीब जनता को सीधे प्रभावित करते है। 

जबकि आजादी के 70 वर्ष बाद भी आम नागरिक के सामने शिक्षा, सुरक्षा, स्वास्थ सहित रोटी, कपड़ा, मकान जैसे मुद्दे आज भी अनसुलझे पढ़े है। उस पर से देश में ही नहींं विश्व बिरादरी में बढ़ता आतंकवाद समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार असंवेदनशीलता, कत्र्तव्य विमुखता से जुड़े अनगिनित सवाल है। 

मगर दुर्भाग्य कि इन पर न तो हमारे राजनैतिक दल चर्चा करना चाहते है, न ही मानवता से जुड़े, इन अहम मसलों पर सरकारे मीडिया, चर्चा कराना चाहते है, न ही इस देश की नौकरशाही संवैधानिक संरक्षण प्राप्त होने के बावजूद कोई समाधान खोजना चाहती है। 

कई मसले ऐसे  है जिनका हल सरकारे व नौकरशाह बगैर किसी हो हल्ले के कानून के तहत कर सकते है, मगर उन पर भी हमारे महान दल, मीडिया चर्चा करा, अपना अपना वोट बैंक मजबूत रखना चाहते है। टी.व्ही. पर बिलखते हमारे दलो के प्रवक्ता शायद भूल रहे है कि महान भारत की जनता यूं ही महान नहीं है उसका अगाध स्नेह आस्था यूं ही अहिंसा, परमोधर्म, बसुवदैव कुटु बकम, त्याग, न्याय आपसी भाई चारा स मान में नहीं है। बल्कि इन सब का मिश्रण उसकी रंगों में खून बनकर दौड़ता है। वह जिस आस्था के साथ जिस भी दल में विश्वास व्यक्त करती है यह उसका अपना कत्र्तव्य है। जिसके चलते वह चुनी हुई सरकारों या विपक्ष में बैठने वाले दलो से अपने खुशहाल सुरक्षित जीवन की उ मीद रखती है। वहीं आस्था उ मीद उसकी उस मीडिया से होती है जिसका अखबार व टी.व्ही. वह पूरे दाम चुकाने के बाद उसकी समस्याओं के प्रतिबि ब को देखने लालाहित रहती है। मगर अब मीडिया, नेताओं,  दलो के संगठित समूह के आचरण और विलाप से धीरे-धीरे उसका मौह भंग होता जा रहा है। 

मगर मजबूरी हमारे लोकतंत्र और इस देश के आम नागरिक की यह है कि इल दलो, पूंजीपति, मीडिया ने चुनाव प्रक्रिया इतनी मंहगी जटिल कर रखी है कि आम गरीब का इस सत्ता के खेल में बगैर किसी दल पूंजीपति का संरक्षण लिये वह सत्ता का सहभागी नहीं बन सकता और वह विलबिलाने पर मजबूर है। 

बेहतर हो देश के दल सत्ता में रहते, देश व देश की महान जनता द्वारा अपेक्षित देश व देश के नागरिकों की खुशहाली हेतु आवश्यक मुद्दों पर बहस कर एक ऐसा माहौल तैयार करें जिससे देश में सुरक्षा खुशहाली का मार्ग प्रस्त हो और लोग अपना अपेक्षित जीवन जी स्वयं को गौरान्वित महसूस कर सके। और यह तभी स ाव है जब हमारी सरकारें दल, नेता, मीडिया और बुद्धिजीवी क्षणिक लोकप्रियता, स्वार्थो को छोड़ लोक कल्याण की दिशा में बहस कर, अपने अपने कत्र्तव्यों का निर्वहन करे। तभी हम महान राष्ट्र और महान नागरिक कहला पायेगें। 
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