बेड़ा गर्ग करते, गैर जरुरी असंगठित, असंयमित व्यान

व्ही.एस.भुल्ले। अब इसे कॉग्रेस का सौभाग्य कहे कि दुर्भाग्य कि कॉग्रेस केन्द्र की ही नहीं कई राज्यों में विरोधी दलो के सुनियोजित षडय़ंत्र के तहत असंगठित, असंयमित व्यानों के चलते सरकारें गबाने के बाद भी सबक नहीं सीखना चाहती। 

यह यक्ष सवाल आज कॉग्रेस के अन्दर चर्चा का विषय हो या न हो मगर समुचे देश या प्रदेशों में अवश्य है। अब सवाल यूपीए सरकार के दौरान भ्रष्टाचार जनलोकपाल या फिर आजादी के 65 वर्षो की उपलब्धि अनउपलब्धि को लेकर रहे हो। या फिर धर्मनिरपेक्षता, जाति, क्षेत्र जिस तरह से विपक्षी दलो और मीडिया की उकसाऊ शैली के चलते कॉग्रेस को उकसाया गया और उसके जबाव में जो असंगठित, असंयमित व्यानों का जो दौर कॉग्रेस में शुरु हुआ वह आज भी थमने का नाम नहीं ले रहा। 

कभी-कभी अफसोस ही नहीं दया भी आती है कि देश के इससे सबसे बड़े दल पर कि आखिर इसकी भाषा, बॉडी लेंग्यूज को क्या हुआ है, जो गैर जरुरी मुद्दों पर असंगिठत, असंयमित तरीके से व्यान देती चला आ रहा है। 

देखा जाये तो हालिया दो घटनाक्रम सर्जिकल स्ट्राइक और प्रधानमंत्री की लखनऊ यात्रा को लेकर है। सर्जिकल स्ट्राइक के तत्काल बाद कॉग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी एवं राहुल गांधी के व्यान तक तो ठीक था जिससे कॉग्रेस का ग्राफ अचानक बड़ा, मगर दो ही दिन बाद ऐसा क्या हुआ कि सबूत की बात चल पड़ी। इतना ही नहीं कि 26 दिन की कड़ी यात्रा के समापन पर स्वयं राहुल का ही असंयमित भाषा में गैर जरुरी व्यान आ गया। अब 26 दिन तक राजनैतिक रुप से खंूखार प्रदेश में खाट सभा और यात्रा करने के बाद भी उन्हें ऐसा क्यों महसूस हुआ कि इतना तीखा व्यान देना चाहिए। बैसे भी राजनीति का पहला का कहरा और प्रकृति भी शिक्षा देती है। कि चढ़ते सूरज को प्रणाम करने की हमारी संस्कृति, पर परा है इतिहास भी यहीं बताता है कि हिन्दु धर्म के ग्रन्थ भी लाख दुश्मनी के बावजूद एक दूसरे के स मान का पाठ युद्ध मैदान में बताते है फिर चाहे भगवान राम, कृष्ण की गाथाओं में हो या फिर इशु की प्रार्थना में जिनमें दुश्मन के प्रति भी स मान मर्यादा का पाठ सिखाया गया है। फिर ये तो महान भारत है जहां सभी धर्म, संस्कृति के लोग मिलजुल कर रहते है। 

बहरहाल बगैर स यता, संस्कृति जाने संस्कार विहीन भाषा कभी भी मानव उपयोगी नहीं हो सकती। जिस देश में स मान स्वाभिमान की खातिर बड़ी-बड़ी सत्तायें रावण, कंष, अत्याचारी, मुगल, अंग्रेजों तक की नहीं टिकी तो वो सत्तायें कैसे सुरक्षित रह सकती है। जिनके रहते मानवता ही नहीं इन्सानियत भी कलफ रही हो। ऐसे में धैर्य, संयम, संघर्ष ही वह अस्त्र बचता है जिससे बड़ी-बड़ी सल्तनों को उखाड़ फेका गया। ऐसे में वह क्षणिक, भ्रामक प्रचार कैसे ल बी सत्ता का प्रतीक हो सकता है। जिसकी बुनियाद ही झूठ पर टिकी हो। आज नहीं तो कल इस सब जबाव जनता स्वयं मांगेगी यह भारतीय संस्कार है। इसलिये सत्य ही वह मार्ग है, जिस पर चल संयम के साथ संघर्ष ही एक मात्र रास्ता है। जो आज नहीं तो कल कॉग्रेस की खोई प्रतिष्ठा को वापिस लौटा सकता है। 
SHARE
    Your Comment

0 comments:

Post a Comment