स्वार्थो की जुगाली अभिव्यक्ति का अधिकार नहीं, आदर्श राजनीति का आभाव स्वस्थ लोकतंत्र में बाधा

व्ही.एस.भुल्ले। खून की दलाली, कॉग्रेस विहीन भारत, मनुवादी विरोध या फिर धर्म, भाषा, क्षेत्र रक्षा के नाम गढ़ेे जुमलों के सहारे खुद के अस्तित्व को कायम करने वाले लोग सत्ता प्राप्ति के संघर्ष या विरोध में भूल जाते है कि इस तरह की बातों से न तो लोकतंत्र मजबूत होगा, न ही स्वस्थ  लोकतंत्र का अस्तित्व बचेगा। 

विभिन्न मुद्दों को लेकर बढ़ती सामाजिक, राजनीति कट्टरता का आलम यह है कि मानव समाज में जिस धर्म को सर्वोपरि माना जाता है अब उसके अक्स भी आस्था व वैचारिक तौर पर टूटने लगा है। जो किसी भी दृष्टि भी किसी भी मानव समाज या उस राष्ट्र के लिये उचित नहीं, जहां वह निवास करते है। 

अब कारण आज हमारे महान देश में सत्ता संघर्ष या सतत सत्ता में रह राष्ट्र व राष्ट्र के नागरिकों की सेवा, सुरक्षा और बेहतर भविष्य गढऩे के लिये राजनैतिक तौर पर जो चल रहा है वह बड़ा ही दुर्भाग्य पूर्ण है। जिसका प्रमुख कारण वोटो की राजनीति और सं या बल आधार पर प्राप्त वोटो से चुनी सत्ता दूसरा प्रमुख कारण राजनैतिक तौर पर आधे से अधिक हमारा अपरिपक्व वोटर जिसे खाने कमाने वंश बढ़ाने से फुरसत ही नहीं जो वह राष्ट्र और समाज के बारे सोच सके। 

क्योकि हमारी 70 वर्ष की आजाद यात्रा में सत्ता में रहे समझदार लोग यह तय ही नहीं कर सके कि हमारे राष्ट्र के नागरिकों का जीवन स्तर क्या हो। 1977 के बढ़ती आबादी को रोकने के मंसूबे सत्ता संघर्ष में मय सत्ता क्या साफ हुई डरी सहमी राजनीति 1977 से सत्ता के लिये तो अनेको मुद्दों को लेकर संघर्षरत रही। मगर एक भी सरकार ने पूरी मुखरता के साथ बढ़ती जनसं या को रेाकने के प्रयास नहीं किये। परिणाम कि विकास की सुनियोजित सोच और संसाधनों के आभाव में विस्फोट की तरह बढ़ी आबादी ने शेष मौजूद व्यवस्था को ही चौपट कर दिया। 

तो दूसरी ओर वोट की चोट से हलाक राजनेताओं, राजनैतिक दलो को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि अगर भीड़ का याल नहीं रखा गया तो सत्ता सुनिश्चित नहीं, फिर क्या था देश में बड़े-बड़े  प्रयोग हुये समानता के भाव के साथ समाजवाद, हिन्दु, संस्कृति की रक्षा हेतु राष्ट्रवाद ऊंच नीच को कम करने मनुबाद को गालियाँ दे, सत्ता संघर्ष का दौर शुरु हुआ। मगर इस बीच उन महान विद्ववानों के खिलाफ किसी ने मुंह नहीं खोला जो कट्टरता व समाज में बैमनस्यता फैला भले लोगों के धैर्य की परीक्षा लेते रहे और आज भी ले रहे है। और अपनी महात्वकांक्षा पूर्ति हेतु भारतीय स यता, सिद्धान्त, मूल्यों को सरेयाम तिलांजली दे, अराजकता का माहौल तैयार कर रहे है। 

धर्म, जातियों, भाषा, क्षेत्र आस्था व जीवन जीने का माध्ययम हो सकती है जिससे मानव प्रकृति की गोद में निर्धारित मूल्य सिद्धान्तों को साक्षी मान बगैर किसी को कष्ट पहुंचाये हिल-मिल कर एक दूसरे को समझ सहयोगी बन खुशहाल शान्तिपूर्ण रह, अहिंसक जीवन व्यतीत कर सके। 

मगर आज की राजनीति में धर्म, जाति, ााषा, क्षेत्र अहिंसा के नाम खुशहाल जीवन देने वालो वाली विधा मानव जाति के लिये सत्ता प्राप्ति के घातक अस्त्र बन गये है। जिनका सत्ता संघर्ष में विगत 30 वर्षो से खुलकर प्रयोग हो रहा है हालात तब और खराब नजर आते है। जब मूल्य, सिद्धान्त आधारित वैचारिक दल भी खुलकर इन अस्त्रों का खुलकर प्रयोग करते नजर आते है और देश की आधे से अधिक आबादी दहशत में जीवन विताती है। क्योंकि देश में विगत 30 वर्षो से इसी तरह की फसल काटी बोई जा रही है और जो साम, नाम, दण्ड, भेद की राजनीति विदेशी मामलों में अपनाने का उल्लेख था वह राजनीति देश के अन्दर ही सत्ता प्राप्त करने अब अपनों के ही बीच अपनाई जाती है। 

गिरते राजनैतिक स्तर में दोष किसी व्यक्ति विशेष समाज का नहीं असल दोष तो उन सत्तासीनो और नौकरशाहों का है जिनका कत्र्तव्य संविधान से प्राप्त संरक्षण के आधार पर कानून का पालन कराना था। मगर नौकरशाह, नेताओं के गठजोड़  ने न तो लोकतंत्र के मन्दिरों तक पहुंचने से अपराधियों को रोक पाये। न ही देश की निरीह जनता को संसाधन मुहैया करा उन्हें काम पर लगा पाये, बल्कि इस बीच कट्टरता की फसल को सीच एक ऐसे समाज की स्थापना कर डाली जहां शान्ति खुशहाली कोसो दूर और इन्सानियत अचेत नजर आती है। 

बेहतर हो अभी भी समय शेष है हम लोकतंत्र में पैर पसारती इस बुराई को रोक सकते है और ऐसी अस य संस्कृति पर विराम लगा सकते है जिसमें खून की दलाली, किसी दल के अस्तित्व को ही नष्ट करने जैसी भाषाओं का इस्तमाल और चन्द लोग धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र के नाम अराजकता का नंगा नाच करे। आज ऐसी ताकतों को हमें एक जुट हो, रोकना ही होगा, बरना हमारा भविष्य क्या होगा ये तो समय ही तय करेगा। 
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