टीआरपी बाजोंं से सावधान रहे देश

व्ही.एस.भुल्ले। जिस तरह से देश के अहम मुद्दों को विसार देश की तथाकथित मीडिया, पूंजीबाद, या टीआरपी के दबाव के चलते वेसर पैर के मुद्दें बड़ी ही बैरहमी से देश के सामने लाती है, उसे देख आम आदमी का विचलित होना स्वभाविक है। किस दल, नेता ने क्या कहा उस पर बेक्रिंग, बड़ी-बड़ी बहस देश को दिखाना मीडिया का भाग हो सकता है, मगर इससे भी अहम मुद्दें देश में मुंह बाये खड़े है, चाहे वह बैरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा को लेकर हो या फिर गांव गरीब, आम किसान से जुड़े हो, उन पर न तो ब्रेकिंग है, न ही बड़ी बहस देश दहशत में जी रहा है। बढ़ती अराजकता दम तोड़ती व्यवस्था, सडक़ पर जनता के द्वारा हो रहे, फैसले इस बात के प्रमाण है कि हमारी दिशा गलत है जो हमारा नुकसान कर सकती है। 

हालिया उदाहरण राहुल का जिन्होंने अपनी 26 दिनों की किसान यात्रा के समापन पर भावना बस उन शब्दों का इस्तेमाल कर लिया जिसे महान मीडिया द्वारा उचित नहीं, इसलिये कि भाषा संयमित नहीं थी। मगर सुर्खियाँ परोसने वाली उस भाषा जिसका लाभ मीडिया ने जमकर उठाया, अगर दूसरे शब्दों में कहे कि देश के प्रति सारी जबावदेही सत्ताधारी दल या विपक्ष की है, यह सही नहीं।  मीडिया की भी तो कोई नैतिकता बनती हैं, भूल किसी से भी हो सकती, भावना व्यक्त करने का तरीका जाने अनजाने में स य समाज में स्वीकार्य न हो, मगर हमारा देश विविधता वाला है। जिसमें कई धर्म, भाषा, बोलियों वाले लोग रहते है। 

अगर इसी तरह सनसनी परोसने वाले व्यानों को तरजीह दी जाती रही तो निश्चित ही हम अराजक भाषा शैली की ओर बढ़ रहे है, जो किसी भी तरह राष्ट्र हित में नहीं। जिसको देश के हर दल, नागरिक, मीडिया को समझना चाहिए और वह कैसे खबर हो सकती, जिसका दुरुपयोग कर दुश्मन देश व देश की खिल्ली उड़ाये। 
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