मटिया मेट पर उतारु अधिकारी, सडक़ों के संकट से मुक्ति पर, संदेह बरकरार

व्ही.एस.भुल्ले विलेज टाइम्स, 15 सितम्बर 2016 म.प्र. शिवपुरी। म.प्र. के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान हाई लेवल बैठकों में भले ही अपने आला अधिकारियों को बातों के बजाये काम करके दिखाने की नसीहत देते दिखें। मगर मठ्ठर अधिकारियों पर मुख्यमंत्री की मंशा का कोई असर हुआ हो, ऐसा लगता नहीं। ऐसे में लोगों के बीच यह समझ बनना लाजमी है कि सरकार या तो लोगों के संकट को समझती नहीं, या समझना ही नहीं चाहती। शिवपुरी में सडक़ों की दुर्दशा से निजात पाने सरल से समाधान से इतर संकटों के पहाड़ तोडऩे में माहिर हो चुकी प्रशासनिक मशीनरी की समझ पर अब तो तरस आता है। वहीं सब कुछ जानते हुये भी अधिकारी, कर्मचारियों से काम न ले पाना, अर्कमण्य, निक मे अधिकारियों पर कार्यवाही न कर पाना अब लोगों की समझ से परे होता जा रहा है। 

 हालिया मामला शहर की सडक़ों को लेकर हुई बैठक में सामने आया है। अपुष्ट सूत्रों की माने तो सडक़ों की दुर्दशा से मुक्ति के लिये आहुत समीक्षा बैठक में यूं तो क्षेत्रीय विधायक एवं खेल युवक कल्याण धार्मिक न्यास धर्मस्य मंत्री यसोधरा राजे सिंधिया, पोहरी विधायक प्रहलाद भारती, शिवपुरी कलेक्टर ओपी श्रीवास्तव, पुलिस अधीक्षक एम.यू. कुर्रेशी, पी.डब्लू.डी अधीक्षण यंत्री मंडोलई कार्यपालन यंत्री गुप्ता, पी.एच.ई. के अधीक्षण यंत्री, कार्यपालन यंत्री बाथम, शिवपुरी एस.डी.एम. रुपेश उपाध्याय, नगर पालिका सी.एम.ओ. रणवीर सिंह, सहायक यंत्री एवं उपयंत्री सहित कई अधिकारी मौजूद थे। जिसमें प्रत्येक सडक़ निर्माण एवं मौजूदा स्थिति पर चर्चा हुई। बुलाये गये ठेकेदारों से भी चर्चा की गई तथा कार्य पूर्ण करने और शुरु करने की भी बात हुई। जिसमें एक सडक़ का कार्य निरस्त कर पुन: टेन्डर बुलाने पर सहमति बनी। 

मगर बैठक के अंत तक कलेक्टर, एसपी द्वारा सुझाये गये बेहद व्यवहारिक सडक़ सुधार के तरीकों पर कोई खास सहमति नहीं बन सकी। जबकि एसपी, कलेक्टर द्वारा व्यवहारिक एवं सडक़ सुधार का सर्वोत्तम तरीका बताया गया। मगर शहर को खून के आंसू रुलाने वाले पी.डब्लू.डी. को रहम नहीं आया और वह अपने इन्जीनियरिंग एवं नियम कानूनो का हवाला देखकर बचते दिखे। 

बहरहाल अगर पी.डब्लू.डी. के मशवरे पर सडक़ेे निर्माण हुई तो नहीं लगता कि शहर की सडक़ेे जल्द बनने वाली है। क्योंकि बैठक में जिस तरह के कुर्तक पी.डब्लू.डी. के अधिकारी कर रहे थे उससे लगता नहीं कि शहर की बिगड़ी सडक़ों की हालत सुधरने वाली है। क्योंकि जिस तरह से पी.डब्लू.डी. द्वारा लगभग 26 करोड़ का एक ही टेन्डर बुलाने की बात की जा रही थी और सडक़ निर्माण प्रकृति को बदलने तकनीकी स्वीकृति की बात दोहराई जा रही थी। उससे तो कम से कम यही उ मीद की जा सकती है कि पी.डब्लू.डी. विभाग की सडक़ सुधार में कोई दिलचस्वी है। जबकि सच तो यह है कि दो बाई दो किलोमीटर में फैले शहर की आधी सडक़े तो नगरपालिका की है और लगभग आधी सडक़ें पी.डब्लू.डी की है। 

विगत 1 वर्ष से जिस तरह से पी.डब्लू.डी. सारे संसाधन होने के बावजूद अपनी अर्कमण्यता का सबूत दे रहा है वह किसी से छिपा नहीं। अब ऐसे में सडक़ों की हालत क्या होगी भगवान ही जाने। फिलहाल तो अभागे इस शिवपुरी शहर को सडक़ों के संकट से मुक्ति मिलने वाली नहीं। 

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