जीवन्त संवाद के आभाव में आक्रोश की अभिव्यक्ति का तरीका गलत: जूता राहुल पर नहीं रणनीतिकारों पर

व्ही.एस.भुल्ले  विलेज टाइम्स/27 सितम्बर 2016। रसातल की ओर जाती कॉग्रेस में जान फूकने देवरिया से लेकर दिल्ली तक की जिस किसान यात्रा का नेत...

व्ही.एस.भुल्ले  विलेज टाइम्स/27 सितम्बर 2016। रसातल की ओर जाती कॉग्रेस में जान फूकने देवरिया से लेकर दिल्ली तक की जिस किसान यात्रा का नेतृत्व राहुल कर रहे है। इस यात्रा में राहुल तो एक प्रतीक मात्र है, जो देश व देश वासियों की आशा आकाक्षांओं को समझने लोगों के बीच जा रहे है। मगर इस यात्रा के दौरान काफिले पर इस आरोप के साथ जूता फेकना कि 60 वर्ष कॉग्रेस ने राज किया तब किसानों की बदहाली की याद नहीं आयी, 18 जवान शहीद हुये तब भी राहुल अपना रोड़ शो याद रहा। हालाकि राहुल ने इसे आर.एस.एस. भाजपा की साजिस करार दिया है। 

मगर यहां समझने वाली बात यह है और हमारे संस्कार बताते है कि सत्य के साथ चलने में बाधाये तो आती है और सत्य को समझने की जिसमें जैसी क्षमता हो, उसकी प्रतिक्रिया भी उसी अनुसार आती है, सो यह केवल वह प्रतिक्रिया है, जो भ्रम पूर्ण माहौल के बीच अज्ञानता बस एक नौजवान के माध्ययम से आलोकतांत्रिक तरीके से आयी है। अब इस घटनाक्रम के पीछे जो भी लोग हो, मगर घटना हुई है, और वह भी कॉग्रेस के सर्वोच्च नेतृत्व के काफिले पर और वह भी ऐसे किसी व्यक्ति द्वारा जिसे ज्ञान ही नहीं कि 60 वर्ष के कॉगे्रस शासन में किसानों के लिये क्या-क्या किया गया। 

शायद आक्रोशित ऐसे किसी भी भाई को, जबकि वह स्वयं को पत्रकार कहता है तो उसे ऐसे लोगों से कुछ सबाल अवश्य करना चाहिए जो कहते है कि कॉग्रेस ने किसानों के लिये क्या किया। जो लोग देश की युवा पीढ़ी को भ्रमित कर, देश के महान संगठन व उसके नेताओं पर अपनी स्वार्थ पूर्ण क्षणिक प्रसिद्धि के लिये ओछे घटिया आरोप लगाते है।  

पहला यह कि देश को यह नहीं भूलना चाहिए कि आजादी एक 1 दशक बाद तक आधे से अधिक आबादी ज्वार, बाजरा, मक्का, कठिया गेंहू, कुटकी, जौ की रोटियां खाया करते थे, या फिर कम उत्पादित होने वाले सीजनल फल, हरी सब्जियों के मोहताज हुआ करते थे। सिंचाई रेहट, कुआं, तालाब, नहर से किया करते थे कृषि मशीनरी के नाम नैसर्गिक हल पिलाऊ, बेलजोड़ी, बेलगाड़ी इत्यादि हुआ करती थी। खाद के नाम देशी खाद, बिजली, विहीन सडक़ विहीन शिक्षा, स्वास्थ्य, टी.व्ही. मोबाईल, मोटरसाईकिल, ट्रेक्टर विहीन हमारी ग्रामीण व्यवस्था थी। कोसो मील पैदल चल लोगों को शहर पहुंचना होता था। गांव गरीब के बीच सूत खोरी, जमीदारी प्रथा चरम पर थी। सिंचाई, उघोगों का नामों निशान तक नहीं था। मगर आजादी के बाद जिस तरह से बांध, नहर, उघोगों की स्थापना हुई जय जवान, जय किसान के नारे के साथ हरित क्रान्ति, जमीनों का चकबन्दीकरण, बैंको का राष्ट्रीयकरण, इलेक्ट्रॉनिक संचार, मोटर व्हीकल सहित बिजली, सडक़ क्रान्ति का आगाज हुआ बिजली, टुयूबबेल, उन्नत बीज खाद, कृषि यंत्रों पर सब्सिटी गोदाम पर सब्सिटी ने किसानों को आत्म निर्भर बनाया। आज जो लोग मक्का, ज्वार, बाजरा, कठिया गेंहू, कुटकी, जोकरा की जगह उन्नत खादन्य उपयोग करते है, इतना ही नहीं 12 माह सीजनल सब्जी, फलो बाजारों में उपलब्ध रहते है। चकबन्दि व बैकों  के राष्ट्रीयकरण किसान क्रेडेट कार्ड, भूमिअधिग्रहण बिल के चलते, अब किसान स्वयं को मुफीद मेहसूस करते है। 70,000 हजार करोड़ के रिण माफी जैसे फैसले किसानों के हित की बात करते है। इतना ही नहीं जलग्रहण मिशन ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन, रोजगार गारन्टी, सूचना अधिकार, राष्ट्रीय आवास पंचायती राज, गांव-गांव शिक्षा जैसे कई कार्य है, जो सीधे-सीधे किसानों की खुशहाली का बखान करते है, जिसमें संचार क्रान्ति ने तो गांव, गरीब, किसान को सीधे दुनिया से जोड़ा है, जिस कॉग्रेस ने कानूनन गांव के किसान को दिल्ली की सत्ता में भागीदारी दी, पंचायती राज लाकर, जिस किसान को भूमि व सूत-खोरों से सुरक्षा दें, कृषि की उन्नत तकनीकी सब्सिटी के माध्ययम से दी, जिस कॉगे्रस ने नाते-रिस्तेदारों से महीनों तक स पर्क न होने के चलते संचार क्रान्ति के माध्ययम से सेकेन्डो में स पर्क कर बात करने की ताकत किसान को दी। जिन दूर सुदूर गांवों में राजीव गांधी, जलग्रहण मिशन, ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन,शिक्षा मिशन, छोटे मजोले गरीब किसान को रोजगार गारन्टी के माध्ययम से परिवार को गांवों में ही भरण पोषण की व्यवस्था और शोषण से निवटने सूचना का अधिकार जैसी दी हो। सो यह अदना-सा जबाव उस या उस जैसे भ्रमित आक्रोशित युवाओं को राहुल या कॉग्रेस का हो सकता है, और यही जबाव उन लोगों के लिये भी हो सकता है, जो कॉग्रेस का 60 वर्ष का इतिहास  जानना चाहते है। 

मगर इसके उलट एक सवाल कॉग्रेस के उन रणनीतिकारों के लिये भी हो सकता है, जो घरों में बैठ या 10 जनपथ, राहुल के आगे पीछे घूम स्वयं को देश का कद्दावर नेता समझते है। आखिर इतने वर्षो तक 10 जनपथ के खास और सत्ता में बने रहने के बावजूद वह देश वासियों को सारे संसाधन मौजूद होने के बावजूद क्यों नहीं बता सके कि कॉग्रेस ने 60 वर्षो के राज में किसानों के लिये क्या किया। अगर रणनीतकारों की मण्डली ने यह कार्य किया होता तो यह भ्रमित उस युवा के इस तरह सवाल पूछने का कोई सवाल ही नहीं होता, जो उसने जूता उछाल कर कॉग्रेस से किया। 

क्योंकि हमारी स यता, संस्कृति, संस्कार और इतिहास बताता है कि जब संवादहीनता बढ़ती है तो निश्चित ही निर्णय गलत होते है और बिचौलिये इसका लाभ उठा जमकर स्वार्थो का मूल्य बटोरते है, वहीं कॉग्रेस के साथ हुआ। राहुल को समीक्षा इस बात की करनी चाहिए स्वर्गीय इन्दिरा, राजीव जी से सीखना चाहिए कि जिनके लिये हम जीना, मरना चाहते है उनकी हमसे क्या आशा, आकांक्षायें है और यह तभी स भव है जब हम विभिन्न माध्ययमों के साथ देश वासियों से सीधा संवाद रखे। 

बहरहाल हर गलती और नया विरोध हमें स्वयं की समीक्षा और सीखने का मौका देती है यह तो मात्र शुरुआत है और देश के कई प्रदेशों में से उत्तरप्रदेश मात्र एक प्रदेश है। लोकसभा में 500 से अधिक सीटे है, देश में लगभग छोटे-बड़े मिलाकर 29 प्रदेश व कुछ केन्द्र शासित राज्य है। जरुरत आज राहुल को इसी निडरता के साथ उन शक्तियों का सामना करने की है जो भ्रम का आभा मण्डल तैयार कर कॉग्रेस को खत्म करना चाहती है।

मगर उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि राहुल उस खानदान का चस्मो चिराग है जिसने पूरी निर्भीकता और निष्ठा के साथ देश की सेवा की है, फिर परिणाम जो भी रहे हो, इसीलिये उन महान हस्तियों का देश आज भी रिणी है, जिन्होंने देश व देश वासियों को सत्ता से ऊपर समझा।  

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