सिंगूर के फैसले और ममता के संघर्ष से सबक ले देश: अन्नदाताओं के साथ हुये अन्याय पर न्याय की मुहर

विलेज टाइम्स। अन्नदाताओं के न्याय मिलने में समय अवश्य लगा, मगर अन्नदाताओं की जीत अन्याय पर मुक मल है, सिंगूर के इसी मामले को लेकर परिश्चम बंगाल की वर्तमान मु यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा जब अन्याय के खिलाफ मैदानी विरोध किया उस समय उनके इस आन्दोलन को उघोग विरोधी करार दिया। मगर इस विधानसभा चुनाव से पूर्व हुये विधानसभा चुनाव में ममता के नेतृत्व वाली तृणमूल्य कॉग्रेस की प्रचण्ड जीत ने यह साबित कर दिया कि उनका संघर्षपूर्ण आन्दोलन सिंगूर के अन्नदाताओं के लिये ठीक था। और वह पश्चिम बंगाल की मु यमंत्री बनी और इस मर्तवा भी उन्हें प्रचण्ड जीत मिली। 

 अब जबकि सिंगूर मामले में अन्नदाताओं के साथ हुये अन्याय पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा न्याय की मुहर लगा दी गई है। ऐसे में गांधी बादी विचारक पीस फाउन्डेशन के उपाध्यक्ष और एकता परिषद के संस्थापक सदस्य राजगोपाल पी.वी. का यह कहना कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा सिंगूर मामले में दिया गया फैसला केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं रहना चाहिए वह पूरे देश में लागू होना चाहिए। 

जहां भी स्पेशल इकोनौमिक जोन और विकास कार्यो के नाम पर सरकारों ने निजी लोगो को जमीने दी है, वे किसानों को वापस मिली चाहिए क्योंकि इस देश की 65 फीसदी आबादी गांव में है जिनकी अजीविका खेती आधारित है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का फैसला इस ओर इशारा करता है कि जो तौर तरीके राजनेताओं के पूंजीपत्तियों के यक्ष में सोचने वाले है। उन्हें चुनौती देने का वक्त आ गया है। क्योंकि सस्ते दामों पर विकास के नाम हासिल की जाने वाली जमीनों को बेच मोटा मुनाफा कमाने वाली क पनियों ने इसे धन्धा बना रखा है। राजगोपाल पी.वी. की चिन्ता और सुझाब ठीक है। 

क्योकि जिस तरह से सरकार कोई भी शासकीय भूमियों लीज पर दे, हर वर्ष रेन्ट प्राप्त करती है। उसी प्रकार किसानों की भूमि भी अधिग्रहण करने के बजाये लीज पर ली जाये। हर वर्ष उन्हें रेन्ट दी जाये। उपयोग न होने पर वह भूमि किसानों को ही वापिस दी जाये। 
मगर हद तो यह है हमारे सिस्टम में लीज पर ली गई भूमि फिर चाहे वह सरकारी हो या अधिग्रहित की गई प्रायवेट जमीन हो, विकास के नाम बड़े पैमाने पर देश भर में यह खेल खेला गया। मगर 2013 के परिवर्तन  में अवश्य कुछ राहत किसानों को मिली। मगर मौजूदा सरकार एक बार फिर से परिवर्तन का प्रयास किया जो असफल रहा। 

बहरहाल जो भी हो आखिर हम आजाद भारत में अप्रासांगिक हो चुके अंग्रेजो के बनाये कानून, सिस्टम को और कब तक ढोते रहेगे चाहें वह देश की शिक्षा नीति, आन्तरिक सुरक्षा, संचार, स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़ी सेवाओं का राजनेता, नौकरशाह और अब तथा कथित मीडिया के गठजोड़ का दंश कब तक झेलेगें। कहां-कहां न्यायालय हस्तक्षेप करे। पूरा सिस्टम चरमरा रहा है। जरुरत है ममता जैसे परिणाम मूलक एक ऐसे संघर्ष की जिसकी अनुभति देश का आम नागरिक मेहसूस कर सके। 
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