उत्तरप्रदेश की सियासत और सुशासन का सच: खाट की लूट का सवाल यक्ष हो सकता है, मगर संपूर्ण सच नहीं

व्ही.एस.भुल्ले, विलेज टाइम्स। ये अलग बात है कि छवि चमकाऊ रणनीतकारों के सहारे कॉग्रेस उ.प्र. में अपनी ाोई जमीन खोजने का प्रयास कर रही हो, मगर देश को 9 प्रधानमंत्री देने वाली उ.प्र. की राजनैतिक जमीन सियासी माहौल से इतनी अन िाज्ञ होगी, जैसा कि राजनैतिक दल जनभावनाओं की कीमत पर सत्ता हासिल करते, आज तक चले आ रहे। फिलहाल उ.प्र. का राजनैतिक माहौल विभिन्न जाति वर्गो में बटा पड़ा है। जिसे हमारे राजनैतिक पण्डित सामाजिक यांत्रिकी के सहारे भुनाते चले आ रहे है। अगर यो कहे कि आजादी के बाद से सर्वाधिक राजनैतिक रुप से जागरुक कोई प्रदेश धर्म, जाति, वर्ग के बटबारे की पीढ़ा से गुजर रहा है, तो वह उ.प्र. है तो कोई अतिसंयोक्ति न होगी। 

बैसे भी भारत जैसे भावुक देश में आधे से अधिक सुनिश्चित रोजगार और पर्याप्त भोजन के लिये परेशान हो, ऐसे में इस तरह की बुराईयों का पनपना स्वस्थ्य लोकतंत्र के लिये घातक है। आज कॉग्रेस जिस प्रष्ठ भूमि की तलाश में उ.प्र. ही नहीं समुचे देश में संघर्षरत है उसके लिये समय या फिर वह स्वयं भी दोषी है और जब भाड़े की छवि चमकाऊ या जमीनी हकीकत से अनजान शुभचिन्तकों की मण्डली के सहारे जो सपना कॉग्रेस सजोये बैठी है हो सकता है आम वोटर की मजबूरी के चलते उसे आंशिक सफलता मिल भी जाये। मगर पूर्ण गौरव प्राप्त करने के लिये सटीक रणनीत और समर्पित कार्यकत्र्ताओं से सुशजित संगठन की उसे स त जरुरत होगी। 
कोई भी तकनीक कितनी भी कारगार क्यों न हो, अगर आपका लक्ष्य और रणनीति चमकदार होने के साथ सशक्त नहीं, तो वह कभी सफल नहीं हो सकती। क्योंकि बाजार की एक अलग विधा है और भावनाओं का समर्पण एक अलग विषय , जो व्यक्ति के आचरण और व्यवहार पर निर्भर करता है। देखा जाये तो कॉग्रेस के भावी नेता राहुल गांधी का आचरण और व्यवहार दोनों ही भारतीय संस्कार और पर पराओं के नजदीक है। मगर उनकी हर पहल पर संका कुशंका स्वभाविक है और वह किसी भी स्वस्थ्य लोकतंत्र में होना भी चाहिए। 
आज कॉग्रेस को जरुरत है कि उन जीवंत मुद्दों की जिनकी मुरीद आज देश की जनता है। फिर भले ही राजनैतिक तौर पर सरसब्ज उत्तरप्रदेश ही क्यों न हो, जिस तरह से देश की मीडिया ने खाट की लूट को, विचार और जरुरत से जोड़ा है वह एक वर्ग विशेष तक सीमित हो सकता है। जो उ.प्र. की राजनीति के लिये अहम विषय हो सकता है। क्योंकि सर्वाधिक किसान वोटरों की सं या उ.प्र. में हो। मगर कॉग्रेस को रणनीति तय करते वक्त कॉग्रेस के इतिहास से सबक लेना चाहिए क्योंकि कॉग्रेस ने आजादी के पूर्व से लेकर वर्तमान तक कभी जाति, धर्म, वर्ग विशेष से जुड़ी राजनीति नहीं की। उसने सभी को साथ लेकर राजनीति को आगे बढ़ाया। अगर कुछ दल और उनके नेताओं को छोड़ दें, तो देश में मौजूद अधिकांश राजनैतिक दलो की विचारधारायें कॉग्रेस के नजदीक अधिक देखी जा सकती है, या फिर कभी न कभी उनका  या उनके परिवार का वास्ता कॉगे्रस से औपचारिक अनौपचारिक रुप से रहा है। 
आज जिस र्दुगति का शिकार कॉग्रेस जैसा महान संगठन है उसके लिये कुछ हद तक स्वयं कॉग्रेस के वह नेता जि मेदार है जिन्होंने समर्पित कार्यकत्र्ताओं से संगठन को निस्तानाबूत कर स्वयं को स्वयंभू कमान्डरों की भूमिका में आलाकमान की मजबूरियों का फायदा उठा, विरोधियों दलों के सहारे स्थापित कर लिया। आज हालात यह है कि कॉग्रेस के कई जमीनी नेता इन्हीं स्वयंभू कमान्डरों की कारगुजरियों के चलते या तो संगठन छोड़ स्वयं का संगठन खड़ा कर चुके है, तो कुछ दूसरे दलो का दामन थाम चुके है। शेष रहे लोग स्वयं की उपेक्षा और कुबेरपत्तियों के बढ़ते रसूख के चलते घर बैठ चुके है। अब जबकि राहुल गांधी के रुप में कॉग्रेस को एक जबावदेह कद्दावर नेता मिला है तो एक उ मीद लोगों में अवश्य जाग्रत हुई है। मगर कॉग्रेस की रणनीत और संगठनात्मक रणनीत सहित उठाये जा रहे तत्कालीक मुद्दों के मद्देनजर नहीं लगता कि कॉग्रेस के नये युवा तुर्क या फिर कॉग्रेस की मुश्किले कम होने वाली है। 
जिस तरह से टी.व्ही. डिवेटों में प्रवक्ता बैक फुट पर या फिर मुद्दा विहीन तर्को में उलझे नजर आते है, उसे देखकर नहीं लगता कि कॉग्रेस या कॉग्रेस के रणनीतिकारों में अभी भी इतिहास से कोई सबक लिया है। जबकि किसी भी प्रकार की डिवेट, मुद्दों और कुर्बानी सहित कामयावियो से कॉग्रेस का इतिहास भरा पड़ा है। दु:ख होता है उन कॉग्रेसियों को जो एक  कद्दावर लड़ाको की तरह हाथ बांध कर, युद्ध के मैदान में चुप रहने पर मजबूर नजर आते है। क्योंकि न तो ऐसे लड़ाकों के पास कोई पहचान है न ही उनका उस सेनापति से कोई स पर्क, जो दृणता के साथ देश और देश वासियों के लिये लड़ कुछ बेहतर करना चाहता है। ऐसे में राहुल को चाहिए कि वह उ.प्र. के 200 से अधिक विधानसभा क्षेत्रों की 25 दिनी यात्रा के दौरान अपनी आंख, कान खुले रखे और उन्हीं मुद्दों पर चर्चा करें जिसके लिये महान कॉग्रेस जानी जाती है। 
यह कार्य वह देश के सर्वोच्च सदन संसद में भी बखूवी निभाते रहे है, अगर सडक़ पर जब चलने निकले है तो सडक़ पर भी वह यह कार्य बखूबी कर सकते है। तभी वह उ.प्र. के रण की बाजी कॉग्रेस के पक्ष में कर सकते है। भले ही धर्म, जाति, वर्गो की सियासत उ.प्र. में सर चढक़र बोल रही हो। ऐसे में राहुल को जरुरत है कि वह वीरबल की तरह वे काम जगह पर भी काम स्थापित कर स्वयं की सर्वोच्चता संगठन ही नहीं, देश में स्थापित करने की शुरुआत करें, तब फिर न तो खाट की लूट पर सियासत होगी और न ही यक्ष सवालों पर टीका टिप्पणी।  

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