देश को समर्पित प्रधानमंत्री जी की आड़ में, सियासी खेल: राजनीति में अघोषित इमरजेन्सी के संकेत

विलेज टाइम्स, 13 सितम्बर 2016। कभी सुनते थे कि राजनीति में पुलिस की भूमिका अहम होती है इसलिये सरकार के मुखिया ग्रह मंंत्रालय अपने पास रखते थे या फिर अपने किसी विस्वस्त व्यक्ति को ग्रह मंत्री बनाते थे। 

आज जब देश की राजनीति में जनता से जुड़े मुद्दों को छोड़ एफ.आई.आर. अहम मुद्दा बन रहा हो, ऐसे में धीमी मगर अघोषित इमरजेन्सी जैसे हालात नजर आने लगे है। यहां बात हम केवल केन्द्र या किसी राज्य विशेष की सरकार की नहीं कर रहे। क्योंकि सभी सरकार संवैधानिक प्रतिबद्धता व शपथ अनुसार संकल्पित और कटि बद्ध है, अब अगर ऐसे में केन्द्र सरकार या राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में ऐसा कुछ हो रहा है जिसे चर्चाओं में धीमी मगर अघोषित इमरजेन्सी करार दिया जा रहा है। तो विचारणीय प्रश्र है समुचे देश को इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि देश आज एक सशक्त हाथों में है। हमें गर्व होना चाहिए कि हमारे प्रधानमंत्री बगैर छुट्टी लिये दिन-रात देश व देश वासियों की सेवा में जुटे है। इतना ही वह उस अखण्ड भारत के सपने के साथ आगे बढ़ रहे है, जिससे एक सशक्त खुशहाल राष्ट्र का निर्माण होगा। 

मगर हमारे प्रधानमंत्री जी का दूसरा पहलू यह भी है जो ओजस्वी भाषण अखण्ड खुशहाल भारत को लेकर 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से दिया। उससे आधे से अधिक देश, सुनने, पढऩे से अनभिज्ञ रह गया। जिस पर सरकार की तरफ से कोई सफाई नहीं, जिस निष्ठा ईमानदारी से वह अपने कत्र्तव्य निर्वहन में जुटे है। कुछ को छोड़ दें तो उतना सहयोग उन्हें अपने सहयोगियों  या फिर उन राज्य सरकारों से नहीं मिल रहा जिन राज्यों में उन्हीं के दल की सरकारे है विपक्षी दलो की सरकारों का विरोध, सहयोग तो समझा जा सकता है। मगर उन्हीं के दलो की सरकारों में प्रधानमंत्री जी की महत्वकांक्षी योजनाओं उनकी भावनाओं से आम जन का अनभिज्ञ रहना समझ से परे है। 

बहरहाल जिस तरह से कॉग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ  विभिन्न प्रकरणों को लेकर एफ.आई.आर. या न्यायालीन केस चल रहे है। जो मात्र दो वर्ष की ही बात है, खासकर सोनिया गांधी, राहुल गांधी, मोती लाल बौरा, ए.के. एन्टोनी या अन्य दलो के नेताओं सहित सरकारों के खिलाफ आन्दोलन करने वालो पर विभिन्न धाराओं के तहत प्रकरण पंजीबद्ध हो रहे। यह पर परा लोकतंत्र में स्वस्थ्य नहीं कहीं जा सकती। 
खासकर जब संगीन अपराधी बैल पर छूट रहे हो, लोकतंत्र में अपराधियों, देश द्रोहियों के खिलाफ स त कार्यवाही से किसी को आपत्ति नहीं हो सकती, मगर राष्ट्र, भक्ति या विकास के नाम नव नेतृत्व प्रतिभाओं का दमन हो, यह भी उचित नहीं। 

अगर ऐसा ही देश की राजनीति में चलता रहा कि वैचारिक विरोधियों को कैसे कुचला जाये। सही आवाज उठाने वालो का मुंह कैसे बन्द किया जाये तो राष्ट्र बाद के नाम होने वाली इस तरह की कार्यवाहियों से 1977 की घोषित इमरजेन्सी और इस अघोषित इमरजेन्सी में अन्तर क्या रह जायेगा। 

विपक्ष द्वारा सरकार पर तीखे हमले लोकतंत्र की स्वभाविक प्रक्रिया है, जिसे स्वस्थ्य लोकतंत्र में सही होने पर पोषित करना सरकार का धर्म होता है। अगर किसी लोकतंत्र में समुचा विपक्ष दागी, एफ.आई.आर या न्यायालीन प्रक्रिया में उलझ जायेगा तो फिर लोकतंत्र कहा रह जायेगा, विचारणीय पहलू है।  

बेहतर हो कि सरकारों के रणनीतिकार इसे समझे और विपक्ष भी अपनी गरिमा अनुसार जनहित, राष्ट्रहित में सकारात्मक सोच के साथ गलत नीतियों पर तीखा विरोध करे। टीका टिप्पणी में जहां सत्ताधारी दल तो विपक्ष को भी अपनी गरिमा का , याल रखना होगा तभी हम स्वस्थ्य लोकतंत्र जिन्दा रख पायेगें। 
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