कॉग्रेस की बेसिक मूल्य सिद्धान्तों पर चौंकाने वाली चुप्पी पर सवाल: म.प्र. में कुपोषण से 37 मौत सैकड़ों प्रभावित

व्ही.एस. भुल्ले/म.प्र. ग्वालियर, श्योपुर 18 सितम्बर 2016। म.प्र. के आदिवासी बाहुल्य श्योपुर जिले में कुपोषण से हुई मौतो पर मचे कोहराम पर कॉग्रेस की चुप्पी पर अब उसके बेसिक मूल्य सिद्धान्तों को लेकर सवाल होने लगे है। ये अलग बात है कि लोकसभा में सचेतक गुना सांसद एवं पूर्व केन्द्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने आदिवासी बाहुल्य श्योपुर जिले के दो विकासखण्ड कराहल, श्योपुर विकासखण्डों में हुई आदिवासी बच्चों की मौंतो पर गांवों में पहुंच उनके परिजनो को ढांढस अवश्य बंधाया है। मगर जिस तरह से जिला प्रशासन द्वारा श्योपुर जिले के गांव में कुपोषित बच्चों की जांच हेतु भेजी जा रही टीमों की जांच उपरान्त जो आंकड़े सामने आ रहे है, वह बड़े ही चौंकाने वाले है। जिन्हें देखकर इन्सानियत भी कांप जाये। 

देखा जाये तो आजादी से लेकर आज तक आदिवासी वोटर म.प्र. में कॉग्रेस का बेसिक वोट बैंक रहा है और कॉग्रेस के सत्ता से 12 वर्ष पूर्व बाहर होने के पश्चात लगातार आदिवासियों के साथ अत्याचार, अन्याय बड़ा है। जिसमें कुपोषण से होने वाली मौंते तो आम बात है, जिसमें श्योपुर के वर्तमान घटनाक्रम में इन्सानियत को ही झंझकोर कर रख दिया है। बात अगर कुपोषण से मरने वाले बच्चों या भूख प्रभावित लोगों तक की होती तो बात चल जाती। मगर इस जिले में ही नहीं इससे सटे शिवपुरी, अशोकनगर, गुना, दतिया, मुरैना, भिण्ड, ग्वालियर में मौजूद जन्म मृत्यु दर आंकड़े बताते है कि इन जिलों में माताऐं भी बड़े पैमाने पर खून की कमी या कुपोषण का शिकार है। जिसमें एक बड़ी सं या आदिवासी वर्ग की है। 

मगर यक्ष सवाल यह है कि जिस आदिवासी वोट ने कॉग्रेस को कभी निराश नहीं किया उन वन वासी, वन पुत्र आदिवासियों के साथ हो रहे इतने बड़े अन्याय पर देश का कॉग्रेस नेतृत्व क्यों चुप है। जबकि म.प्र. के मात्र एक जिले में ही विगत 3 महिने के अन्दर 37 बच्चे जान गवां चुके है और सैकड़ों मौंत से संघर्ष कर रहे है। अगर मीडिया में आ रहे,जन्म-मृत्यु दर के सर्वे आंकड़ों की माने तो एक हजार पर 43 बच्चे तो ऐसे है, जो 1 माह के अन्दर ही ईश्वर से मिले जीवन को जाने बगैर ही माता-पिता को पहचाने बगैर ही इस दुनिया से चले जाते है। वहीं पांच वर्ष तक के एक हजार पर 98 बच्चे ऐसे है, जो ईश्वर या माता-पिता को पहचान ही पाते है और दुनिया छोड़ जाते है। 

 जिस देश में अपराधी, बलात्कारी, आतंवादियों को लेकर ल बी चौड़ी डिवेट और टियूटर पर तत्कालीक व्यान आते हो, उस देश में ही वनवासी, आदिवासियों का दर्द न सुना जाये इससे दर्दनाक बात इस देश में और कोई नहीं सकती, काश कॉग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व ने किसानों के साथ जंगलों में भटक कुपोषण से दम तोड़ते उनके नौनिहालों पर संज्ञान लिया होता तो विगत 12 वर्ष से सत्तासीन उस सरकार से देश ठीक से सवाल-जबाव कर पाता। जो अपने अखबारी सुशासन की ढीगे हाकने में पीछे नहीं रहता और अपने नौनिहालों के दर्द से तपड़ते आदिवासियों को तत्कालीक और फौरी राहत मिल पाती। क्योंकि मसला बड़ा है और आदिवासियों का दर्द ाी असहनीय, फैसला कॉग्रेस को लेना है।  

उरी में हमला निदनीय, मगर जिम्मेदारों को सबक जरुरी 
जिस तरह से पठानकोट के बाद उरी बेस के प पर देश के दुश्मनों का हमला हुआ और हमारे जवानों को शहादत देनी पड़ी वह कम से कम अब तो खाली नहीं जाना चाहिए। सरकार को सभी विकल्पों को साथ रखकर ऐसा जबाव देना चाहिए जिससे देश के दुश्मन फिर से सर न उठा सके। जिसमें सीमा पर सुरक्षात्मक रणनीति के साथ विदेश नीति सहित और जो भी विकल्प मानवता की रक्षा के लिये उपयुक्त हो सकते है। उन पर चर्चा कम और काम ज्यादा होन चाहिए। अगर देश के दुश्मन छदम युद्ध छेड़ कर अपनी उपस्थिति बार-बार सेना पर हमले कर बताना चाहते है तो उनको भी उन्हीं की भाषा में निर्णायक जबाव देना चाहिए। 

उरी में हुये हमले में जो नुकसान भारतीय सेना को उठाना पड़ा है यह किसी भी सेना के लिये सैनिको की भाषा में एक नैसर्गिक प्रक्रिया माना जा सकता है। मगर देश की सेना व देश के स्वाभिमान के साथ इस तरह का घिनोना कृत स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसके लिये अगर जरुरत पड़े तो सरकार को सभी विकल्पों के साथ किसी भी सीमा तक जाने के लिये तैयार रहना चाहिए क्योंकि देश की असमिता: के साथ किसी भी प्रकार का समझौता किसी भी कारण से नहीं किया जा सकता। जरुरत पड़े तो सरकार को अपने मित्र देशो के सहयोग से भी ऐसे देशो के खिलाफ ऐसा माहौल बनाना चाहिए जिससे ऐसे देश जो मौत के सौदागरों को संरक्षण देते है। उन्हें अन्तराष्ट्रीय जमात के सामने वेनकाब करना चाहिए तभी हम देश वासियों को यह विश्वास दिला पायेगें, कि हम सजग भी है और सतर्क भी है और ऐसी निंदनीय घटनाओं को अन्जाम देने वालों से निवटने में सक्षम भी है।
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