जनता को जागरुक होने का वक्त जहन्नुम बनता लोकतंत्र

विलेज टाइम्स/व्ही.एस.भुल्ले। लोकतंत्र में हर सरकार और उसके कार्यपालिका तंत्र से आम नागरिक की अपेक्षा होती है कि वह अपने-अपने कत्र्तव्यों का निर्वहन कर उनका जीवन सुरक्षित और खुशहाल बनायेगें, मगर तत्समय हमारी सरकारों और कार्यपालिका व्यवस्था की न जाने क्या मजबूरी है जो वह अपने कत्र्तव्य निर्वहन में न काफी साबित हो रही है। 

कारण साफ है विधायिका से जुड़े लोग जहां अगले पांच वर्ष के लिये पुन: कैसे चुने जाये। कैसे उनकी सत्ता सुरक्षित रहे। यहीं सोचते पांच वर्ष निकाल देते है। वहीं कार्यपालिका से जुड़े अधिकांश लोग अच्छी पोस्टिंग एवं बढिय़ा वेतन भत्ते की तिकड़म में समय निकालते रहते है। इस बीच अगर जनता का कोई भला हो सकता है तो हो जाये। बरना बाकी तो भगवान भरोसे है। किसी भी महान लोकतंत्र के लिये इससे बड़ी हास्यपद स्थिति और क्या हो सकती है। कि हर समय सुरक्षा कर्मी और संसाधनों के आभाव में व्यवस्था सरेयाम कानून का उलंघन करने वालो के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं कर पाती। 

बकॉल व्ही.आई.पी. डियूटी, खेल, मेला इत्यादि के नाम सुरक्षा बलो को सेकड़ों की तादाद में इधर-उधर करना होता है। हद तो तब है जब माननीय न्यायालयों के आदेश निर्देशों तक को सरेयाम ठण्डे बस्तेे में डाल कानून के रखवालो के सामने ही कानून क्यों ठेंगा बता उसका मजाक उड़ाया जाता है। 

जिस तरह से धार्मिक स्थल, धार्मिक आयोजनों के नाम मु_ी भर सरफिरे लोग भोले भाले नागरिकों की भावना की आड़ ले। शान्त प्रिय म.प्र. में सत्ता लालचियों और अर्कमण्ड नौकरशाही का लाभ उठा, अराजकता फैलाने पर उतारु है। यह न तो शासन न ही प्रशासन और न ही सरकार से छिपा हुआ है। 

सरेयाम शासन की जमीन पर धर्म या धार्मिक स्थलों की आड़ में कब्जे हो रहे है। सडक़, नल, बिजली ही नहीं आयोजनों के नाम रास्ते रोक, कोलाहल पूर्ण माहौल बनाते, शासकीय परिस पत्तियों को नुकसान पहुंचाते है। 

मगर न तो शासन सरकार के नुमान्दे एस.बी., सी.आई.डी. से ऐसे लोगों के रिकार्ड तैयार कराते, न ही सुरक्षा बल बढ़ाते न ही स त कार्यवाही में दिलचस्वी दिखाते है। आज लोग सुबह होते ही पेट के लिये परेशान है रात होते ही चैन की नींद सोने हैरान है। शेष बचे सुरक्षा कर्मियों का आलम यह है कि काम के दबाव तले कई गंभीर बीमारियों का शिकार तो कुछ मजबूरन न फरमानी के शिकार है। 

ऐसे में जरुरत है जनता को जागरुक होने की जिससे वक्त आने पर ऐसी सत्ताधारी या विपक्षी दल जो आंख पर पट्टी और कान में तेल डाल अगली मर्तवा स्वयं को सत्ता में आता देखते है। 
अगर आज भी हम लकीर के फकीर बन ऐसे लोगों को सत्ता या विधानमण्डलों में बिठाते रहे तो वह दिन दूर नहीं जब चैन की नींद तो दूर की कोणी, आम रास्तों से गुजरना भी किसी स य नागरिक को श्राफ साबित होगा। 
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