शिवपुरी में अराजकता फैलाने पर आमादा शिवराज शासन: दशहत में शहर

विलेज टाइम्स/मप्र शिवपुरी। सेवा, सुविधा, सुरक्षा के नाम लोगों को खून के आंसू रुला वेमौतें मरने पर जिस तरह से शहर के नागरिकों को मरने पर मजबूर किया जा रहा है यह शासन से लेकर सरकार तक अब किसी से छिपा नहीं, कोई इसे शिवराज सरकार की प्रतिशोध की राजनीति करार देता है। तो कोई सिंधिया घराने के नेताओं को उन्हीं के क्षेत्र से उखाड़ फैकने की राजनीति सच क्या है यह तो शिवराज सरकार और शासन सहित सियासतदार जाने, मगर सेवा, सुविधा, सुरक्षा के नाम इस शहर की जो दुर्गति विगत वर्षो से हो रही है उसने लोग का जीवन नरक ही नहीं असुरक्षित बना दिया है। 

शिवराज शासन में शिवपुरी के हालात ऐेसे है कि युवा बुजुर्गो ने तो हैरान, परेशान, हताश हो चीखना चिल्लाना ही बन्द कर दिया। जैसे तैसे एक तो मर्तवा स्कूली बच्चों ने अन्याय की आवाज उठाई तो उन्हें भी पुलिस प्रकरण दर्ज कराने की सरेयाम धमकी ने उन पढऩे-,लिखने वाले नौनिहालों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया कि वह आजाद भारत में जी रहे है। या फिर एक असंवेदनशील, तानाशाह सरकार के बीच। 

शासन को झूठी रिपोर्ट प्रस्तुत करने में माहिर जिला प्रशासन का आलम यह है कि कोई किसी की सुनने तैयार नहीं, परिणाम कि प्रशासन में चहुं ओर अराजकता पसरी पढ़ी है लोग कलफ रहे है, मर रहे है। मगर उनकी इस विवसता का समाधान किसी के पास नहीं। 
मगर हद तो तब है जब स्वयं को लोकतांत्रिक संगठन कहने वाले गैंग बना, धृतराष्ट्रों की तरह जनभावनाओं का चीरहरण देख चुप खड़े है। वहीं दरबारी बने सरकार व शासन की ब शीस पर जिन्दा सरकार के यसोगान गाने में लगे है। 

बात यहीं खत्म नहीं हो जाती, इस शहर का एक दुर्भाग्य यह भी है कि सुराजुदौला, जय चन्दो के कै प भी इसी शहर में कम नहीं जो एक नया इतिहास गढऩे में पीछे नहीं। अब ऐसे में बैवस दया की पात्र वो जनता कहा जाये जिससे चुनावों के वक्त इमोशनली, भावनात्मक ढंग वोट हासिल कर जनसेवा के कॉल उठाये जाते है। और चुनाव पश्चात सारे दोष उसी निरीह गरीब जनता पर मढ़ दिये जाते है जिसके दिन की शुरुआत खाने, कमाने और स्वयं के बल पर जिन्दा रहने के साथ होती है। 

शिवपुरी शहर का यह वह कड़वा सच है जिसे परवान चढ़ाने में शहर के चन्द लालचियों, स्वार्थी की टोली शहर में आय दिन मूल्य सिद्धान्त, सुविधा, सेवाओं की परि ााषा शहर के भोले भाले नागरिकों के बीच भ्रम फैला अपना उल्लू सीधा करने में लगी रहती है। पूरे तौर पर संगठनात्मक टोली को शायद यह भ्रम है कि नरक बनते इस शहर में वह अपनी इस उस्तादी के बल पर शुकून से रह पायेगें। मगर उन्हें शायद यह इल्म नहीं कि समय कभी एक सा नहीं होता। उसमें परिवर्तन समय अनुसार हो रहता है। 

उन्हें यह समझना होगा कि जब भी समय के विपरीत इस कुव्यवस्था का कुरुप चेहरा गलियो से निकल, जब सडक़ पर आयेगा। तो रसूख तो छोडिय़े ऐसे लोगों को जमीन तलासना मुश्किल होगा। बेहतर हो सरकार ऐसी ओछी सियासत से बाहर निकल मानवता की खातिर उस हार को भूल जाये जिसका आरोप आज सरकार के सरमाथे चल रहा है वहीं विपक्षी दल भी उस मुगालते से बाहर आये कि बिल्ली का छीका 2018 में उनके ही भाग्य से टूटने वाला है और मक्खन भी उन्हीं के मुंह मेंगिरने वाला है। 

जनाकांक्षाओं को अपमानित करने वालो को समझना चाहिए कि जिस जनता को खून के आंसू रुला कलफने पर मजबूर किया जा रहा है आखिर उसी जनता के वोट से सरकार बनती बिगड़ती है, और टेक्स के रुप में जनता जो धन सरकार को देती है उससे सरकारी व्यवस्थायें चलती है। तथा उसी धन से मु यमंत्री, मंत्री, नेता, नौकरशाह, कर्मचारियों के वेतन भत्तों की पगार बटती है। इसलिये हर एक जि मेदार व्यक्ति को बगैर किसी भेद-भाव के अपना कार्य पूर्ण निष्ठा ईमानदारी करना चाहिए बरना कहावत भी है कि ऐसी हाय गरीब की कभी न खाली जाये, मरी खाल की धौकनी से लोहा भस्म हो जाये। 
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