संदेह को शसक्त करती सियासत, प्रधानमंत्री के संपूर्ण संदेश से क्यों, अनभिज्ञ देश

व्ही.एस.भुल्ले। हर स्वतंत्रता दिवस गणतंत्रता दिवस पर समुचे देश वासियों को उ मीद रहती है कि उनके प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति अपनेे अहम स बोधन में देश की जनता को क्या संदेश देगें, शायद देश के इतिहास में यह पहला मौका है जब देश अपने प्रधानमंत्री के स पूर्ण संदेश से अनभिज्ञ रहा। कारण जो भी रहे हो, मगर यह घटना देश वासियों को आसाधरण सी प्रतीत हो रही। लोगों के  मन में यह भावना रह-रह कर बलबती हो रही है कि आखिर कौन है वह व्यक्ति, संस्था जिसने उस देश के नागरिकों को उनके ही प्रधानमंत्री के सटीक स पूर्ण संदेश से अनभिज्ञ रखने का प्रयास किया है।  

जहां एक ओर प्रधानमंत्री की मंशा अनुसार 70 वे स्वतंत्रता दिवस को केन्द्र सरकार समुचा पखबाड़ा मना रही हो और स्वयं प्रधानमंत्री के लाल किले की प्राचीर से 96 मिनिट के अहम भाषण में देश वासियों सहित दुनिया को दिये स पूर्ण संदेश को मीडिया में स्थान न मिले, खासकर म.प्र. की मीडिया में तो आम नागरिक में संदेह पैदा होना स्वभाविक है।

क्योंकि देश के प्रधानमंत्री का यह भाषण कोई राजनैतिक मंच से दिया गया भाषण नहीं, बल्कि देश की पवित्र लाल प्रचीर से दिया गया वह भाषण है जिसे देखने, सुनने की उत्सकता हर देश वासी में होती है। अगर हम देखें तो 15 अगस्त को देश के प्रधानमंत्री का भाषण देश वासियों के लिये 7:30 बजे से लग ाग 9 बजे तक चला जबकि 9 बजे अन्य जिला जनपद स्तर पर ध्वजा रोहण के कार्यक्रम रहे। स भवत: वह लोगों तो बैसे भी टी.व्ही. पर प्रधानमंत्री को नहीं सुन सके। जिन्होंने इन कार्यक्रमों में स मलित हो व्यस्त रहे। एक उ मीद थी कि 15 अगस्त के बाद समाचार पत्रों में छपने वाले प्रधानमंत्री जी ने लाल किले से देश वासियों को स बोधित करते हुये क्या कहा समाचार पत्रों में पढ़ेगें सुनेनें, मगर दुर्भाग्य कि ऐसा नहीं हो सका। लगभग किसी ाी मीडिया ने देश-प्रदेश वासियों को प्रधानमंत्री के उस स पूर्ण संदेश में व्यक्त की गई उनकी भावनाओं से अवगत नहीं करा पायें। जो हर पाठक दर्शक, देश प्रदेश वासी का हक है। जबकि देश के प्रधानमंत्री ने स्वराज से सुराज की ओर ले जाने के संकल्प के साथ स्वराज सुराज के अर्थ व्यवहार गिनायें, इतना ही नहीं उन्होंने, किसान, मजदूर, सैनिक सुरक्षा से जुड़े मसले भी बताये, हिंसा अहिंसा के परिणाम के साथ उन्होंने जल प्रबन्धन किसानों को खेती लाभ का धन्धा बनाने प्रधानमंत्री बीमा, मण्डी सहित जनधन उज्जवला सहित सरकार द्वारा देश की बेहतरी के लिये किये जाने वाले कार्य भी बताये और गिनाये। उन्होंने सामाजिक समरसता अन्तिम पक्तिं में खड़े व्यक्ति के कल्याण के अलावा पूवर्ती सरकारों की योजनायेें तथा शासकीय धन के समय से सदउपयोग सहित कानूनी सुधार प्रक्रिया से भी देश वासियों को अवगत कराया। 

वहीं उन्होंने देश के बाहर रह-रहे लोगों के मानव अधिकारों के हनन के शिकार लोगों का अभिवादन, धन्यवाद स्वीकार कर यह साबित कर दिया कि कोई भी पड़ोसी इस भ्रम में न रहे कि अब भारत किसी भी हरकत पर खेद व्यक्त करने के बजाये सशक्त संदेश देने में सक्षम नहीं है। 

उन्होंने हिंसा की क्रूरता पर कहा कि वह बड़ा अफसोस होता है जब कहीं पेशावर जैसे लोमहर्षक घटनाक्रम घटित होते है  मानवता के नाते लोगों को इस तरह के घटनाक्रमों से सीख लेना चाहिए व गरीबी के खिलाफ लड़ाई को स मलित प्रयासों से मानवता की रक्षा करना चाहिए। 

मगर अफसोस की प्रधानमंत्री के इस अहम संदेश सेे देश वासियों को मेहरुम रखा गया आ िार क्यों उन राष्ट्र भक्तों की स्याही आम लोगों तक संदेश पहुंचने से पहले ही सूख गयी। 

फिलहाल हमारे देश के महान मीडिया ने जो संदेश देश वासियों को परोसा उसके सियासी मायने जो भी हो, मगर लो संसकित है कि क्यों प्रधानमंत्री की भावना से देश को अनभिज्ञ रखा गया वह भी आजादी के जश्र के वक्त और 70वी वर्ष के पखबाड़े के बीच सोचनीय विषय है। जो किसी ऐसी ताकत के प्रति संदेह पैदा करती है और सरकार की कार्यप्रणाली पर भी प्रश्र चिन्ह लगाती है। जिसका उत्तर फिलहाल भविष्य के गर्व में है।  
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