दमन के रास्ते सेवा असंभव, चींखती सियासत पर सवाल

वीरेन्द्र शर्मा। देश के किसी भी नागरिक, संगठन की सेवा, सियासत, राष्ट्र भक्ति पर तब तक संदेह नहीं किया जा सकता, जब तक कि उनके कार्यो एवं व्यवहार में दमन स्पष्ट परिलक्षित न हो, अगर पूर्व के अन्य आक्रान्ताओं की भांति अगर देश में सत्ता, संगठन, सेवा के व्यवहार में दमन दिखे तो सवाल तो बनते ही है। भले ही वह राष्ट्र के नागरिकों के हित में ही क्यों न हो। सत्ता का व्यवहार आम नागरिक के साथ ऐसा होना चाहिए जिसमें आम नागरिक स्वयं का प्रतिबि ब उनमें देख सके। फिर चाहे वह विपक्ष ही क्यों न हो और यह तभी स भव है जब सत्ताधारी दल और देश भक्त संगठन सहित विपक्षी दलआम नागरिक के खुशहाल जीवन तथा लोकतांत्रिक आजादी के लिये समर्पित रह, राष्ट्र के लिये समर्पित भाव से शहादत के लिये तैयार दिखें।

 मगर हमारे देश में दमन की जो खबरे बलबती हो रही है वह हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था ही नहीं देश व देश के आम नागरिक के लिये भी खतरनाक है। राष्ट्र व राष्ट्र वासियों की खातिर अगर उनके बेहतर भविष्य को गढऩे की कोशिस सत्ता के माध्यम से प्राकृतिक सामाजिक व्यवहारिक मूल्य सिद्धान्तों को तिलांजली दे, हो तो यह प्रकृति ही नहीं मानव जगत के खिलाफ है। बड़ा अफसोस होता है जब जानकारी के आभाव में आम नागरिक अपने ही बीच के किन्हीं संवैधानिक पदो पर बैठे व्यक्तियों पर संदेह कर, उनकी ईमानदारी, त्याग कत्र्तव्यनिष्ठा पर शक करता हंै। इतना ही नहीं वह विपक्ष की भूमिका और बिचाऊ मीडिया को ाी संदेह की दृष्टि से देखता है। 

फिलहाल सवाल भूत, भविष्य को लेकर नहीं, सवाल तो वर्तमान को लेकर है, कारण कई हो सकते है मगर राष्ट्र से बढक़र कोई कारण नहीं हो सकता। फिर चाहे वह भूत, वर्तमान, भविष्य या फिर सेवा ही क्यों न हो।  राष्ट्र और राष्ट्रभक्ति के लिये चिन्तन तो होना चाहिए क्योंकि नागरिक से परिवार और परिवार से समाज और समाजों से मिलकर देश बनता है फिर धर्म, जाति, भाषा जो भी हो, मगर राष्ट्र से बढक़र कोई नहीं हो सकता। 
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हम उस महान भू-भाग के  नागरिक है जहां विश्व की विलक्षण प्रतिभायें जन्म लेती है। और सिकन्दर, अशोक महान की  किवदन्तियां काम करती है। इतना ही नहीं पृथ्वीराज चौहान, महाराणाप्रताप से लेकर शिवाजी, पेशबा की कहानियां भी उस वक्त के घटनाक्रमों को बया करती है। बाल गंगाधर तिलक से लेकर खुदीराम बोस, भगत सिंह, विस्मिल, चन्द्रशेखर आजाद, गांधी से लेकर सुभाष बाबू की कुर्बानियाँ भी कुछ कहती है। पण्डित जवाहर लाल, शास्त्री, इन्दिरा, मोरारजी देशाई से लेकर राजीव तक की घटनायें हर भारत वासी को विचलित करती है। 
चौधरी चरण सिंह और अटल के निर्णय तथा मनमोहन की चुप्पी इस बात की गवाह है कि राष्ट्र और उसके नागरिकों से बढक़र इस भू-भाग पर कुछ भी नहीं।

आज देश का प्रधानमंत्री और विपक्ष का भावी नेता अपना सर्वस्य न्यौछावर करने के बावजूद उस महान राष्ट्र की सेवा करने तथा उसके बेहतर भविष्य के लिये चिन्तित है, जिसे हम हमारा महान भारत वर्ष कहते है, तो फिर संदेह भरे सवाल नहीं होना चाहिए जब तक कि  जनता द्वारा दिये गये समय की समीक्षा न हो जाये। समय से पूर्व सवाल खड़े करना न तो भारतीय संस्कार रहे है, और न ही लोकतांत्रिक पर परा, यह देश के हर नागरिक, संगठन, संस्थाओं को समझने की जरुरत है।  

मगर इसे वक्त का तकाजा कहै या फिर नादानी, कि हम आज भी हमारी गलतियों के चलते बेवजह संसकित जीवन जी सवाल खड़े करने पर मजबूर और बैवस नजर आते है। 
हमें सत्ता के मुखिया और विपक्षी दल के मुखिया पर विश्वास होना चाहिए और यह तभी स भव है जब सत्ता व विपक्षी दल के मुखिया आम नागरिकों में यह विश्वास पैदा कर पाये, कि लाख सहमति, असहमति के बावजूद महान भारत वर्ष के लिये हम एक है क्योंकि हमारा कत्र्तव्य हमेें इस महान भूमि से विमुख होने की इजाजत नहीं देता। 
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