मुखिया के मुख से राजधर्म का सच

व्ही.एस.भुल्ले। कभी देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल जी ने कहा था गुजरात को लेकर कि राजधर्म का पालन नहीं हुआ, मगर विगत दिनों देश के प्रधानमं...

व्ही.एस.भुल्ले। कभी देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल जी ने कहा था गुजरात को लेकर कि राजधर्म का पालन नहीं हुआ, मगर विगत दिनों देश के प्रधानमंत्री ने सच का संदेश कुछ तथा कथित गौरक्षकों को लेकर दिया वह राजधर्म ही है। प्रधानमंत्री के इस संदेश के मायने देश के राजनैतिक दल मीडिया अपना-अपना नफानुकसान देख निकाल सकते है। मगर इतना कड़वा सच कहने की हि मत कम ही नेताओं में होती है। जहां वोट का गणित सियासत में सर्वोच्च स्थान रखते हो। 

मगर देश के प्रधानमंत्री ने स्व. जवाहर लाल नेहरु, स्व. लाल बहादुर शास्त्री, स्व. इन्दिरा और राजीव गांधी के अलावा अटल बिहारी वाजपेयी जैसी स ियतों की तरह सार्वजनिक मंच से राजधर्म का पालन करते हुये सच का संदेश साफ कर दिया। भले ही पूर्व प्रधानमंत्रियों का विषय जो भी रहा हो, इतना ही नहीं उन्होंने साथ ही स्वयं की पीढ़ा भी व्यक्त कर दी कि  छोटी-मोटी समस्याओं पर सीधे प्रधानमंत्री से जबाव मांगना उचित नहीं, सवाल जबाव होना चाहिए। जबावदेह लोगों से जिनकी जबावदेही उस समस्या समाधान की बनती हो। 

प्रधानमंत्री यहीं पर नहीं रुके उन्होंने राज्य सरकारों से भी आग्रह किया है कि वह पता कराकर ऐसे गौरक्षकों की सूची तैयार करा, उन पर कड़ी कार्यवाही करे। जैसे ही देश के प्रधानमंत्री ने सच बोल राजधर्म का पालन किया बैसे ही हमारी दिल्ली के ए.सी. चै बरों में बैठी मूड़धन्य मीडिया का विश्लेषण और प्रधानमंत्री के साहसी व्यान के क्या मायने है। टी.व्ही. के डिब्बों में चिल्लाना शुरु हो गया एक टी.व्ही. पर तो बिहार चुनाव से लेकर उ.प्र. के आसन्न चुनाव के नफा-नुकसान तक समझा दिये गये। वहीं हाथों हाथ विपक्षी दलों के भी व्यान आ गये। 

मगर देश की महान मीडिया को कौन समझायें कि  गाय पूज्यनीय क्यों है, उनका संरक्षण क्यों जरुरी है और देश भर में गऊ माताओं का क्या हाल है। 

अगर मैं भी मेरे पास मौजूद अधूरे ज्ञान के आधार पर कहूं, क्योंकि मैं म.प्र. से आता हूं। जंगलों में गऊ माता के चरने पर मनाही है क्योंकि वन वि ााग के विद्धवान, पर्यावरण विद, रक्षक मानते है कि जंगल में गाय के चरने से उनके खुरो से पेड़, वृक्ष, झाडिय़ों के पौधे नष्ट हो जाते है, जिससे वनो का विकास नहीं हो पाता। 

 वहीं जो चरनोई की भूमि शासकीय हर गांव में हुआ करती थी उसे हमारे पूर्व महान मु यमंत्री राजा दिग्विजय सिंह अपने सलाहकारों की सलाह पर अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति में पट्टो का रट्टा फैला बांट दी गई, शेष चरनोई की भूमि हमारे महान राजस्व की सह पर गांवों, शहरों में बाहुबली नेता दांव गये रही सही शासकीय गऊशालाओं को डेमोस्टे्रशन का रुप दें दिया गया जिनकी सं या भी पर्याप्त नहीं कही जा सकती। वहीं बजट व स्टाफ के आभाव में कानी हाउसों पर भाई लोग ताला जड़ चुके है ऐसे में न अब कानी हाउस है, न अब कानी हाउसों के कर्मचारी रहे, रहा सवाल गऊ पालको का तो कुछ को छोड़ दें तो अधिकांश का वास्ता दूध निकालने तक सीमित है। दूध निकाला शेष समय गऊ माता सडक़ पर, दूध देना बन्द हुआ गऊ माता, ट्रक पर जिन्हें रोक तथा कथित गौरक्षक आय दिन सडक़ों पर दबंगई दिखाते है, तो कुछ वाक्य में ही गऊ माता की रक्षा के लिये उनकी सेवा कर अपना समय गंवाते है। 

अगर हम मान भी ले कि चरनोई गौशाला, कानी हाउसों की व्यवस्थाओं से सरकारे, शासन विमुख हो चुके तो सीधा दूध, कन्डे, ईधन का ला ा लेने वाले पालक जो स्वयं को इन्सान कह स्वयं के साथ शासन द्वारा होंने वाले अन्याय के खिलाफ चिल्लाते है। वह इन्सानियत के नाते क्या कर रहे है, दूध देने तक तो तउम्र स्वयं दूध का सेवन कर, अपने बच्चों को दूध पिला उनका जीवन मजबूत कर रहे है उसके गोबर से कन्डे बना, भोजन बनाने, अन्तेष्ठी, ठंड में ठिठुरते लोग ठंड भगाने का काम करते है और चन्द रुपयो की खातिर कुछ लोग उन्हें कसाईयों के हाथ बैच देते है। ऐसे लोग कैसे इन्सान हो सकते है जो अपनी सुविधा-धन लालसा के चलते गऊ माता के मौत का सामान पोलोथिन को खरीदते बैचते इस्तेमाल कर उन्हें खाने सडक़ों पर चारे के बजाये फैंकते हो वो इन्सान कैसे हो सकते है। 

जिस गऊ माता के दूध में लगभग 86 ग भीर बीमारियों से लडऩे की प्रतिरोधक क्षमता हो, जिसके गोबर को ईधन के लिये गैस और खेतों, जंगलो का सोना उगलने वाली खाद निकलती हो, वो अपने अन्तिम समय में कसाई के हाथ कटने या बगैर धनी-धौरी के ाटकने कैसे मजबूर है। 
देश की मीडिया और दलो में इस बात पर बहस होना चाहिए बहस इस बात पर होना चाहिए कि जब इतना पशुधन ही मौजूद नहीं जिसे न खाने, रहने, जिन्दा रहने तक के लाले हो तो ट्रकों, घी, मावा, दूध कहां से आ रहा है। 
लगता है यह गऊ माता का ही श्राफ है जो अब लोग को मुंह मांगे दामों पर घी, दूध, मावा के नाम जहर और छांच के नाम कैमीकल युक्त मठा मिल रहा है। इससे भारत की नस्ल ही बदलती जा रही है अगर यहीं हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब अमृत के नाम से पहचाने जाने वाला दूध को जहर के नाम से जाना जायेगा। कहते है कि दुआं और बददुंआ कभी खाली नहीं जाती तो गऊ माताऐं तो हमारी बेजुबान है इनकी दुआं बददुआं तो आत्मा से ही निकलती है, मगर क्या करें गऊ माता है सो हो सकता है बददुआं न देती हो। 

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तीरंदाज,321,व्ही.एस.भुल्ले,515,
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Village Times: मुखिया के मुख से राजधर्म का सच
मुखिया के मुख से राजधर्म का सच
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