आतंकित मातृशक्ति पर पुरुषप्रधान समाज की चुप्पी

व्ही.एस.भुल्ले/विलेज टाइम्स। क्या समुचे दक्षिण एशिया की नियति बन चुकी है जो बगैर स ती के शासन नहीं चलाया जा सकता या फिर संस्कार विहीन पुरुषप्रधान समाज की नियति ही ऐसी है। जिसका शिकार अन्तोगत्वा मातृशक्ति को ही होना पढ़ता है। अभी तक तो बात दरबार कोर्ट, कचहरी, पंचायज तक ही सीमित थी। मगर अब फैसला बगैर नियम कानून की परवाह किये ऑन द स्पॉट हो रहा है, जिसमें सडक़ र्दुघटना से लेकर, किसी के द्वारा किसी पर की गई टिप्पणी या क्रिया पर प्रतिक्रिया संस्कार विहीन हो, सरेयाम सडक़ पर हो रही है और ऐसा तब हो रहा है। जब पुरुषप्रधान सत्ता और सरकार हमारे संरक्षण के लिये मौजूद है। आखिर और कब तक हमारी मातृशक्ति अपमानित और पुरुषप्रधान सत्ता तमाशा देखती रहेगी। 

हालिया सवाल बसपा सुप्रीमो मायावती या फिर स्वाति सिंह के बीच छिड़ी जुबानी जंग का नहीं। ऐसे कई घटनाक्रम आय दिन घटित होते है। मगर उनके पास न तो इतने बड़े दल है न ही इतना बड़ा रसूख और न ही इतनी जीवटता है,जो मायावती स्वाति सिंह में उ.प्र. के अन्दर हालिया तौर पर देखने मिली। क्या हमेें नहीं लगता कि हमारे इस स य, समाज  और इस महान भू-भाग पर जो देखने मिल रहा है। जिसकी मूल्य, सिद्धान्त, संस्कार की गाथा गाते-गाते इतिहास नहीं थकते जहां सत्ताओं, सल्तनतों के लिये तो युद्ध होते थे। मारकाट भी होती थी। 

मगर वह सत्ता के स्तर तक ही नैतिक रुप से सीमित थे और उनके निर्धारित मूल्य सिद्धान्त भी तथा वह स्वयं अनुशासित भी थे। तब भी जनता से सत्ता का सरोकार सैद्धानिक मूल्य परख था, न सत्ता जनता को ही आपसी फैसले करने की छूट दे। सारा ध्यान सिंहासन में लगायेे रखने में व्यस्त रहती थी अपने कत्र्तव्य अनुसार सभी धर्म, जाति, भाषा, बोली बोलने वाले लोग प्र्रेम से मिलकर रहते थे। फिर अब ऐसा क्या हुआ जो हम छोटी-छोटी बातों पर एक दूसरे के खून के प्यासे हो, संस्कारों की सारी सीमाये लांग जाते है। अब न तो अंग्रेज, मुगल, राजा, रजबाड़ों की सत्ता है, न ही हम किसी के गुलाम, अब्बल हमारे बीच हमारे द्वारा हमारे बेहतर भविष्य के लिये चुनी हुई सत्ता हमारी है फिर भी हम सत्ता, संस्कार, कानून से इतर नैतिकता की सारी सीमायें तोड़ फैसला ऑन द स्पॉट करने पर उतारु है, जो देश और भारतीय समाज के लिये ग भीर विषय है। 

जिस तरह से पुरुष प्रधान समाज संस्कार विहीन हो मातृशक्ति का माखोल बना समाज के संस्थागत ढांचे को तोडऩे पर उतारु है। कम से कम भारतीय समाज में तो आज न ही कल, न ही भविष्य में स्वीकार्यरता मिलने वाली। 

ये अलग बात है कि पुरुषप्रधान समाज के इन घटिया हरकते से किसी दल या सत्ता का नफा-नुकसान हो सकता है। मगर भारतीय समाज का भला होने वाला नहीं। फिर मातृशक्ति का स मान तो अनादिकाल से रहा है रुप, समय, स्थिति जो भी रही हो।  मातृशक्ति ने ही पुरुषप्रधान समाज को जन्म देकर ही उसे बेहतर खुशहाल जीवन ही नहीं मानव प्रकृति कल्याण के लिये भी समय-समय पर संरक्षित और मार्गदर्शित किया है। और कई राज्य सल्तनतों में मातृशक्ति का बखू्रबी स मान भी रहा है जिसे कोई भी नहीं नकार सकता है क्योंकि मातृशक्ति बहिन, बेटी, पत्नी ही नहीं वह इस पुरुषप्रधान समाज और सत्ता चलाने वालो की जननी भी है। जय स्वराज ............
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