संस्कारों पर सवाल अपमानित होती मातृशक्ति

विलेज टाइम्स। जो घटनाक्रम हालिया रुप संस्कारवान पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष के व्यान को लेकर घटा है वह संस्कारों पर सवाल खड़े करने काफी है...

विलेज टाइम्स। जो घटनाक्रम हालिया रुप संस्कारवान पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष के व्यान को लेकर घटा है वह संस्कारों पर सवाल खड़े करने काफी है। कहते है झूठ कितनी ही साफगाई से क्यों न बोला जाये उसकी हकीकत एक न एक दिन अवश्य सामने आती है। और उ.प्र. में वहीं हुआ जहां राष्ट्र भक्त संस्कारवान अनुशासित पार्टी के सिपाही नहीं पदाधिकारी ने सारी सीमायें तोड़ एक ऐसा व्यान दिया कि उसका परिणाम वोटों की खातिर मजबूर उस पार्टी को सीमायें तोडऩे वाले अपने सार्गिद सिपाही को बाहर का रास्ता दिखा उससे अपना पलड़ा छाडऩा पड़ा। 

उस महान दल की बात यहीं खत्म नही होती, अगर उससे आगे हम भूतकाल में जाये तो भाजपा की स्थापक सदस्य कै. श्रीमंत राजमाता विजया राजे सिंधिया जिन्हेें भाजपा की जननी इसलिये कहा जाता है कि उन्होंने अपना तन, मन, धन  और सारा वैभव लुटा आर्थिक रुप से कमजोर कुछ नेताओं को आगे बड़ा कई कुर्बानियों के बावजूद, उस दल को खड़ा किया, जिसके नेता उनके अवसान के बाद कई वर्ष उपरान्त उनकी मिट्टी को मरघट की मिट्टी कहने से भी नहीं चूके। इसी प्रकार म.प्र. की पूर्व मु यमंत्री सुश्री उमा भारती जिन्होंने अपना समुचा जीवन ही नहीं सारा वैभव पार्टी में लगाने बाद अपने व पार्टी के कत्र्तव्य, मूल्य, सिद्धान्तों की खातिर मु यमंत्री पद त्याग तिरंगे के लिए जेल जाना स्वीकार कर लिया। मगर र्निअपराध साबित होने के बाद जब वह पुन: लौटी तो उन्हें भी अपना मु यमंत्री पद बड़ी पीढ़ा के साथ गबाना पढ़ा और उन्हें नई पार्टी बनाने पर मजबूर कर दिया गया। इतना ही नहीं हाल ही में पार्टी की तीन-तीन महिला मंत्रियों को बगैर किसी अपराध के मंत्री मण्डल विस्तार के नाम अपमानित किया गया। वहीं दूसरी ओर विरोधी दलो के नेताओं के खिलाफ हलकट हरकतें कर उन्हें अपमानित किया जाता रहा, ऐसे दल में उत्तरप्रदेश जैसी घटनाऐं होना स्वभाविक है, जो दल अपने स्वार्थ पूर्ति हेतु संस्कार, संवदेनशीलता, स भता, संस्कृति को तिलांजली दे दे, उससे उत्तरप्रदेश जैसे घटनाक्रमों की ही उम्मीद की जा सकती है।  

पार्टी के लिए समुचा जीवन न्यौछावर करने वाले अटल, आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी से लेकर रामजेठ मलानी, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली तक का सफर अभी भी सुखद नहीं कहा जा सकता, जैसी कि चर्चायें राजनैतिक गलियारों में आम है। 

निशंदेह इस तरह की घटनाऐं और घटनाक्रम लोकतंत्र में किसी भी दल का बेहद व्यक्तिगत मामला हो सकता है, मगर जो चर्चायें अपुष्ट रुप से राजनैतिक गलियारों में हो रही हो तो उन पर संज्ञान लेना स्वभाविक है। मगर बसपा सुप्रीमों के खिलाफ जो संस्कार सामने है वह किसी भी राजनैतिक दल को सबक लेने काफी है। क्योंकि मूल्य, सिद्धान्त, संस्कृति, स यता, संस्कार भी लोकतंत्र में अपनी अहमियत रखते है।

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तीरंदाज,321,व्ही.एस.भुल्ले,515,
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Village Times: संस्कारों पर सवाल अपमानित होती मातृशक्ति
संस्कारों पर सवाल अपमानित होती मातृशक्ति
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