उप्र में कॉग्रेस का सारा दारोमदार किरदारों से इतर कहानी पर है

व्ही.एस.भुल्ले। आलाकमान की सलाहकार, रणनीतकारों का प्रोजक्ट ऑफ ग्लास तो ठीक है जिसमें रणनीतिकारों ने जातीय आधार के साथ कूटनीतिक पक्ष को भी मजबूत रखा है। मगर बुहत निर्भर करेगा उन मुद्दों पर जिन्हें कॉग्रेस उ.प्र. जैसे राजनैतिक रुप से परिपक्व प्रदेश में जनता के बीच लेकर जाने वाली है।

उ.प्र. में जमीनी समझ और कद्दावर छवि के धनी नेताओंं को अगुआ बना कॉग्रेस की ताकत बढ़ाने, जो विश्वास कॉग्रेस आलाकमान ने व्यक्त किया है, अगर सब कुछ ठीक रहा तो निश्चित ही उ.प्र. में अच्छे खासे परिणाम कॉग्रेस को मिल सकते है।

जिसमें सबसे अहम होगे वह मुद्दें जो आम मतदाता ही नहीं सीधे आम जनता से भी सरोकार रखते हो, क्योंकि जिस तरह से उ.प्र. की जमीन पर विगत 25-30 वर्षो में राजनैतिक दलों ने जीत-हार की फसले काटी है वह किसी से छिपी नहीं।
मगर जिस रणनैतिक तौर पर जिन नेताओं को उ.प्र. में कॉग्रेस को पारघाट लगाने नेताओं का प्रेम तैयार किया गया है काबिले तारीफ है।

मगर कहानी की स्क्रिप्ट कैसी हो यह कॉग्रेस आलाकमान को अभी तय करना बाकी है। लेकिन जिस तरह से मीडिया में राहुल जैसे व्यक्त्वि को दरकिनार कर प्रियंका को मु य स्टार प्रचारक बतौर प्रस्तुत किये जाने का प्रयास हो रहा है, यह उ.प्र. जैसे राज्य ही नहीं समुचे देश में  कॉग्रेस के लिए घातक है। क्योंकि विपक्षी दलों की जिस खतरनाक मगर कारगार नीति के तहत जो व्यक्तित्व उनका देश के सामने विगत एक दशक से प्रस्तुत किया जा रहा है उसके लिए अकेले विपक्षी दल ही नहीं, कॉग्रेस के अन्दर भी ऐसे महात्वकांक्षी लोगों की टोली भी हो सकती। जो कॉग्रेस को यहां तक पहुंचाने के बाद अब प्रियंका के नाम को महिमा मण्डित कर भावी कॉग्रेस नेतृत्व राहुल के व्यक्तित्व पर सवाल खड़े करना चाहती हो, जो कॉग्रेस के भविष्य के लिए घातक है।
हो सकता है राहुल में अपने पिता स्व. राजीव और मां सोनिया की तरह कुटिल राजनीति और ऐसे नेताओं के लिये कोई स्थान न हो, न ही राजनीति की वह बारीक समझ जिसमेें देश जनता से इतर स्वयं के स्वार्थ और महात्वकांक्षायें सर्वोपरि हो। अगर यह समझ राजनैतिक आधार पर या उनके खून में होती तो स्व. वी.पी. सिंह से लेकर मनमोहन सिंह तक कॉग्रेस के प्रचण्ड बहुमत की सरकार, संगठन होने के बावजूद प्रधानमंत्रियों की ल बी फेरिस्त न होती।

बल्कि पूर्व प्रधानमंत्रियों की लिस्ट में दो नाम सोनिया गांधी और राहुल गांधी के भी होते। यह आज की स्वार्थी महात्वकांक्षी राजनीति का कटु सच है।
 आज जिस तरह के किन्तु-परन्तु राहुल के व्यक्तित्व और नेतृत्व को लेकर है उसमें इतना अवश्य सवाल हो सकता है कि कटु सत्य को अपनी भाषा व शौली में बगैर लाग लपेट के व्यक्त कर देते है। आज की कुटिल राजनीति के ककहरे को जाने बगैर।
मगर इसके लिए दोषी न तो सोनिया और न ही राहुल है क्योंकि सवा अरब के देश को चलाने वाले इतने बड़े संगठन में कई सहयोगी सलाहकार, शुभचिन्तक लगते है।
और वह आलाकमान के आसपास सीमित भी हो सकते है वह राहुल को सिखा, समझा ही नहीं स्व. राजीव जी की तरह देश भ्रमण खुले रुप से करा, सीखने का मौका दिला सकते थे। मगर सलाहकारों, सहयोगियों ने स्वयं की काबलियत के आगे कभी आगे ही नहीं आने दिया। बल्कि समय-समय पर ऐसे व्यान और चुन-चुन कर ऐसे कार्यक्रमों का अगुआ बनाया गया जिस पर विपक्ष या स पर्क विहीन मीडिया सवाल खड़े कर सके, परिणाम देश व कॉग्रेस के सामने है।

जिस कॉग्रेस ने गली, गांव से निकल कई प्रदेश व देश में लोगों को अपना नाम दे, सेकड़ों लेागों को नेता बनाया हो, वह कॉग्रेस राहुल जैसे साफ दिल इन्सान को सर्वमान्य और जमीनी नेता क्यों नहीं बना सकी, जबकि न तो वह किसी नगर, शहर की गली, न ही गांव में रहते है, न ही आर्थिक रुप से गरीब है और न ही वह किसी पहचान के मोहताज पूरा देश जानता है वह पण्डित नेहरु के पौते, इन्दिरा जी के नाती व देश के पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी के इकलौते बेटे है। जिनकी मां सोनिया गांधी कॉग्रेस की अध्यक्ष है और देश की राजधानी दिल्ली में अमेठी के सांसद के रुप में रहते है। धन उनके पास विरासत मेें स्व. मोतीलाल नेहरु और देश के तीन प्रधानमंत्रियों की विरासत है।

देखने में में सीधे बोलने मृदु व्यवहार और हसमुख और जीवन में कोई व्यसन भी नही।
उसके बावजूद भी कहा कमी रह गयी जो कॉग्रेस से नये-नये स्टार प्रचारक और नये-नये प्रयोग होते रहते है। प्रियंका निश्वित ही एक सहायक की भूमिका में हो सकती है। क्योंकि वह उनकी बहन है और एक जीवट महिला भी, मगर इस सबके बावजूद भी, कॉग्रेस के लिए संभावना और भविष्य तो राहुल ही है विचार आलाकमान को ही करना है और मेहनत राहुल को।   
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