बौद्धिक संपदा का संरक्षण, विकास की समझ, तकनीक जो भी हो, सिद्धान्त एक है

व्ही.एस.भुल्ले. शायद भारत के गर्वनर रघुराम राजन ने सही कहा था कि देश के प्रति व्यक्ति की आय बढ़े बगैर भारत समृद्ध बन सकता। अब चूकि वह भारत...

व्ही.एस.भुल्ले. शायद भारत के गर्वनर रघुराम राजन ने सही कहा था कि देश के प्रति व्यक्ति की आय बढ़े बगैर भारत समृद्ध बन सकता। अब चूकि वह भारत सरकार के गर्वनर है, तो उन्हें देश की अर्थव्यवस्था का व्यवहारिक ज्ञान तो होगा ही और उनका यह व्यवहारिक ज्ञान आज की परिस्थिति में काफी सच के नजदीक भी दिखाई देता है। मगर भारत के विकास को लेकर जिस तरह से नये विचार योजनायें सामने आ रही है वह शायद एक नये भारत निर्माण को लकर हो सकती है। 

मगर कहते है समझ तकनीक जो भी हो लेकिन सिद्धान्त तो एक ही है जरुरत, पूर्ति तथा बौद्धिक स पदा का सरंक्षण। अनादि काल से हर राष्ट्र के चहुंमुखी विकास के लिये एक सशक्त, समृद्ध, शिक्षा नीति की जरुरत होती है। जो ज्ञान के साथ विकास का भी मार्गदर्शन करती है, जिससे किसी भी समृद्ध, शक्तिशाली राष्ट्र का निर्माण होता है। और उस शिक्षा से निर्मित संस्कारों से राष्ट्र की पहचान बढ़ती है।

ये सही है कि हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था की कुछ मजबूरी और कमजोरियां है। मगर आजादी के 67 वर्ष बाद एक राष्ट्र भक्त संगठन की छत्र-छाया में एक राजनैतिक दल के संरक्षण में भारत के प्रधानमंत्री ने दो वर्ष पश्चात मंत्री मण्डल विस्तार कर जो साहस देश की खातिर दिखाया है वह काबिले तारीफ है। इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए कि देश के प्रधानमंत्री की दिशा बिल्कुल ठीक है। मगर सरकार की योजनाओं को पर्याप्त संसाधनों के साथ, भारतीय परिवेश और लोकतांत्रिक व्यवस्था होने के नाते और अधिक व्यवहारिक होने की जरुरत है। 
जिस तरह से देश के प्रधानमंत्री ने अपने मंत्री मण्डल में एक बेहतर समझ, तकनीक रखने वाले ऊर्जावान लोगों को जगह दी है, निश्चित ही हमें परिणामों की उ मीद रखना चाहिए। 

लेकिन देश के प्रधानमंत्री से उ मीद लगाये बैठे, उन बौद्धिक स पदा से स पन्न उन बुद्धिजीवियों को भी पारदर्शी सरंक्षण की जरुरत है जो बगैर किसी राग द्ववेश के देश व देश वासियों के लिये कुछ करना चाहते है। मगर न तो उनके पास कोई प्लेट फार्म है, न ही वह सत्ताधारी दलों के सदस्य और न ही किसी ताकतबर संगठन के सेवक। 
अगर एक लाइन में यो कहें कि देश के प्रधानमंत्री देश में मौजूद उन बौद्धिक विधा स पन्न बुद्धिजीवियों को उनकी विधा को अमेरिका की तरह संरक्षण देने में सफल रहे तो कोई कारण नहीं, जो परिणामों के आने में समय लगे। 

लगता है यह समय वाक्य में ही गांव उदय से भारत उदय का है। मगर इसे व्यवहारिक संरक्षण और शिक्षा की जरुरत है। 
निश्चित ही देश की पूर्व मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति रानी धन्यवाद की पात्र है, जिनके रहते राष्ट्रीय शिक्षा नीति का क्रान्तिकारी प्रकल्प तैयार हो सका। 
बेहतर हो कि वाणिज्य उघोग क्षेत्र से भी निर्माण कत्र्ता या देश के बाजारों में पैठ बनाने वाली क पनियां माल बैचने के साथ अपने प्रकल्प भी दे न कि माल बैच केवल धन उगाही करे। फिर क्षेत्र जो भी हो, अगर हर क्षेत्र में विकास का ककहरा इसी सिद्धान्त पर तय होता है, तो कोई कारण नहीं, जो भारत की विकास दर एक नई ऊचाईयों की ओर अग्रसर हो, वहीं  दूसरी ओर प्रति व्यक्ति आय में भी खासा इजाफा होने के साथ राष्ट्र भी समृद्धि की ओर अग्रसर होगा। 
जय स्वराज .................?

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तीरंदाज,321,व्ही.एस.भुल्ले,515,
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