शिवपुरी: क्रूर सियासत का खौफनाक चेहरा

व्ही.एस.भुल्ले/विलेज टाइम्स/मप्र/शिवपुरी। किसी भी लोकतंत्र में न्याय संगत तर्क यह भी होता है कि जन सुविधाओं की कीमत पर कोई भी विकास कार्य ...

व्ही.एस.भुल्ले/विलेज टाइम्स/मप्र/शिवपुरी। किसी भी लोकतंत्र में न्याय संगत तर्क यह भी होता है कि जन सुविधाओं की कीमत पर कोई भी विकास कार्य न हो जबकि विकल्प मौजूद न हो, मगर सारी नैतिकता नियम कानून ताक पर रख, विकास के नाम पर व्यवस्था ही विनाश पर उतर आये, और वह भी लोक कल्याणकारी सरकार के रहते तो इस तरह के कयास लोगों के बीच आना कि सरकार का आम जनता से क्रूर मजाक शर्मनाक ही नहीं, लोकतंत्र के लिये खतरनाक है। 


मामला है म.प्र. के 100 वर्ष पुराने सबसे सुन्दर सर्वसुविधा युक्त शहर शिवपुरी मेंं डाली जा रही नई सीवर लाइन प्रोजक्ट का है। जिसे पूर्ण करने 9 वर्ष पूर्व केन्द्र सरकार ने राज्य सरकार को जि मा सौंपा था लगभग 60 करोड़ का यह प्रोजक्ट 9 वर्ष बाद पूर्ण तो नहीं हो सका। अब्बल अब अन्तिम सांसे अवश्य गिनते नजर आ रहा है जिससे हैरान, परेशान लोग अब इसे बन्द करने की मांग करने लगे है। सीवर प्रोजक्ट से उजड़ चुके म.प्र. के सबसे सुन्दर सर्वसुविधा युक्त शिवपुरी शहर के सामने अब यक्ष प्रश्र यह नहीं कि प्रोजक्ट पूर्ण हो या फिर बन्द हो जाये। 
इसके चलते अब उसके  सामने कई यक्ष प्रश्न है जिसमें पहला सवाल तो यह है कि कोई भी जनता के वोट से चुनी हुई सरकार लोकतांत्रिक व्यवस्था को तिलांजली दे कैसे अपने नागरिकों से इस तरह का क्रूर व्यवहार कर सकती है।
कोई भी सरकार केसे जनता से टेक्स के रुप में मिलने वाली राशि को सरेयाम लूट और जनता पर अत्याचार का माध्ययम बना सकती है जो लाख, 50 लाख नहीं बल्कि पूरे 60 करोड़ के आस-पास हो। 
कैसे सरकार की नाक के नीचे कोई भी नौकरशाह जनसुविधाओं को मटियामेंट कर शासन की अरबों की स पत्ति को तहस-नहस कर स पूर्ण योजना का मुटिया मेट कर सकता है। मगर म.प्र. के शिवपुरी शहर में सीवर प्रोजक्ट के नाम ऐसा ही हो रहा है। 
देखा जाये तो शिवपुरी सीवर प्रोजक्ट को राशि केन्द्र की यूपीए सरकार ने दी थी्र व कार्य म.प्र. सरकार को कराना था जिसे  पीएचई विभाग कर रहा है। 
अगर जैसे कि कयास है कि सीवर प्रोजक्ट शुरु होने से पहले ही उसे फैल करने की साजिश रची जा चुकी थी जिसकी परत अब धीरे-धीरे खुलती जा रही है। चर्चाओं की माने तो इस प्रोजक्ट की डीपीआर ही ऐसी बनाई गई कि  प्रोजक्ट सफल न हो जिसको क्रियान्वयन एजेन्सी के इन्जीनियरों ने न जाने कैसे और क्यों स्वीकार कर लिया, जबकि शहर की भूगोलिक स्थिति इस तरह की डीपीआर की इजाजत ही नहीं देती फिर भी प्रोजक्ट का कार्य शुरु किया गया। आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्यों पूरे प्रोजक्ट को पूर्ण करने तीन भागों में बांटा गया।  
 देखा जाये तो  क्रियान्वयन एजेन्सी पीएचई द्वारा लगभग 60 करोड़ के प्रोजक्ट को 3 भागों में बाँटना न बर एक सीवर ट्रीटमेन्ट प्लान्ट  दूसरा मेन राइजिंग  और तीसरा डिस्ट्रीबूटरी राइजिंग लाइन, यहां उल्लेखनीय तथ्य यह है कि सबसे अधिक लाभ प्रद टेन्डर जो पूर्णता: प्रोवाइडिंग एण्ड फिक्सिंग पद्धति पर आधारित था पहले लगाया गया उसके बाद मैन लाइन और उसके बाद सीवर ट्रीट मेन्ट का लगाया जो पर्यावरण अनुमति के इन्तजार में फिलहाल हवा में है। जबकि सबसे पहले ट्रीटमेन्ट दूसरा मैन लाइन फिर राइजिंग लाइन का कार्य होना था मगर जानबूझकर क्रियान्वयन एजेन्सी ने सारी इन्जीनियरिंग को धता बता उल्टा कार्य शुरु किया जिससे ज्यादा से ज्यादा पैसे की पाइप खरीदी और खुदाई में मनमाने ढंग से जनता के धन को ठिकाने लगाया जा सके। जहां तक जिस डीपीआर का हवाला दे क्रियान्वयन एजेन्सी घटिया निर्माण करा करोड़ों रुपये वैध अवैध कॉलोनियों में लाइन के नाम लुटा शहर भर की सडक़, टेलीफोन, पानी की लाइनों को तोड़ डेढ़ वर्ष से धूल उड़वा लोगों का जीना मुहाल कर आज भी किये हुये है सही मायने में वह डीपीआर किसी भी घने शहर की सकड़ी सडक़ों, गलियों में बसे शहर के लिये उचित ही नहीं, जिस शहर की गली, सडक़ों की चौड़ाई 60 फीट से लेकर 20 फीट से भी कम से कम हो, और 6 इन्च के पाइप डालने 15-15 फीट गहरी ऊंची-ऊंची इमारतों के बीच खुदवाना कहां तक उचित है। खुदा न खास्ता कभी क पन हुआ तो इस शहर की क्या स्थिति बनेगी अन्दाजा लगाया जा सकता है। 
मगर डेढ़ वर्ष से इस शहर में सब कुछ ऐसा ही सरेयाम चल रहा है। अगर यो कहें कि विगत डेढ़ वर्ष से जिस नरकीय जीवन को इस शहर के लोग मर मर कर जी रहे, तो कोई अतिसंयोक्ति न होगी मगर जब से 2 मजदूरों की सीवर के निर्माणधीन चे बर में मौत क्या हुई है लेागों का अब धैर्य जबाव देने लगा है। 
काश मरने वाले मजदूर इसी शहर के होते तो क्या हालात इस प्रोजक्ट को लेकर होती शायद अन्दाजा लगाया जा सकता है। मगर बेसुध सरकार अभी जागने के बजाये जांच के रास्ते शहर के लोगों के धन और नैसर्गिक सुविधाओं से हो रहे मजाक पर धूल डालने की फिराक में है। बेहतर हो केन्द्र सरकार जिसकी राशि का दुरुपयोग हुआ है और राज्य सरकार की प्रतिष्ठा पर जोर कालिख पुती है। सीवीबाई से निस्पक्ष जांच करा दूध का दूध और पानी का पानी करे बरना सवाल कई है कहीं इतनी देर न हो जायें कि जबाव देना ही मुश्किल हो जाये। तब सारी सियासत रखी रह जायेगी फिर न कोई जांच और न ही कोई तरकीब इस क्रूर सियासत के सामने टिक पायेगी।

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तीरंदाज,328,व्ही.एस.भुल्ले,523,
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शिवपुरी: क्रूर सियासत का खौफनाक चेहरा
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