सिद्धान्त: संस्कारी को समर्पित जीवन्त संपर्क

व्ही.एस.भुल्ले। विलेज टाइम्स, जून 2016- आज जब राजनीति में मूल्य: सिद्धान्त संस्कारों का अकाल पड़ा है, ऐसे में राजनीति के लिये एक राजनेता का सिद्धान्त, संस्कारों को समर्पित आमजन से सीधा जीवन्त स पर्क इस बात का गवाह है कि अभी भी आज की राजनीति में कुछ जान बाकी है और राजनीति से निराश लोगों को एक बड़ी उ मीद।

 मूल्य, सिद्धान्तों की राजनीति का एलानियाँ पक्ष र ा, अपने संस्कारों के बल राजनीति को जनसेवा का बेहतर माध्ययम मानने वाले इस युवा तुर्क का मानना है कि जनतंत्र में जनता सर्वोपरि होती है और हमारे मूल्य सिद्धान्त, संस्कार उसके निस्वार्थ सेवा के बेहतर माध्ययम, राजनीति में यहीं वो दायरा होता है जिसमें रह किसी भी राजनेता को पूरी निष्ठा ईमानदारी के साथ लोगों की सेवा करना चाहिए। 
आम जन से सीधा स पर्क सार्वजनिक व राजनीति जीवन का वह कारगार पैमाना है जो किसी भी राजनेता को उसके कत्र्तव्य, जबावदेही के प्रति हमेशा सजग रखता है। 
मगर राजनीति में गिरती नैतिकता, मूल्य, सिद्धान्तों की राजनीति से बगैर विचलित हुये, यह राजनेता हमेशा स्वयं को संगठन के समर्पित सिपाही के रुप में देखता है। 

नीतिगत विरोध और गरीब जनता, किसान के हक की लड़ाई लडऩे लोकतांत्रिक तरीकों में गहरी आस्था रखने वाले इस सिपाही का दर्द यह है कि वह न तो सार्वजनिक तौर पर न पार्टी फोरम पर अपने संस्कार बस वह विचार व्यक्त करने में गुरेज रखता है। जो किसी भी संगठन में पार्टी फोरम से इतर र ाने पर अनुशासनहीनता श्रेणी में आते हो। या जिनमें स्वयं का स्वार्थ प्रदर्शित होता हो, सही मौके पर संगठन, जनहित में अपनी बात को बेबाक ढंग से रखने में माहिर इस युवा तुर्क को राजनीति यूं तो विरासत में मिली है। मगर उसे और धार-दार बना जनकल्याण को समर्पित इस राजनेता में धैर्य शीलता गजब की है। जो उन्हें एक ग भीर राजनेता के रुप में स्थापित करती है।  

परिणाम कि वह उस संगठन के लिये एक ताकतवर लोकप्रिय जननेता तो है मगर अधिकृत तौर पर वह मार्गदर्शक नहीं, जिससे उस संगठन को मजबूत किया जा सके, जिसका कि वह स्वयं को सिपाही कहते है। 

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