इन्सानियत को गाली, मानव का, जघन्य अपराध, सत्ता कभी सुख के समकच्छ नहीं हो सकती

विलेज टाइम्स। वोटो की खातिर इन्सानियत को, बीच चौराहें पर नंगा करने का जो खेल, सत्ता के लिये, हमारे महान लोकतंत्र और महान तपोभूमि पर जो शुरु हुआ है वह बहुत ही खतरनाक है। और सीधे-सीधे इन्सानियत को गाली भी है। आखिर वौद्धिक रुप से सक्षम, उधार दिल उस वर्ग का क्या अपराध है जो स्वयं व अपनी आने वाली पीढ़ी को गर्त में डाल सामाजिक रुप से शोसित, प्रताडि़त वर्ग का सरंक्षण अनादिकाल से करता चला आ रहा है। 

जो अपने त्याग तपस्या के सहारे उस वर्ग को सक्षम, समानता के मार्ग पर लेकर आया। आज उस वर्ग को, चन्द वोटों की खातिर, चन्द सत्ता लोलुप लोग उनके  खेबनहार बन उनका वोट हथियाने उनके आगे, झूठा स्वांग रच उन्हें यह जताना चाहते है कि वह उनके कितने बड़े हिमायती है। आज हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि प्रकृति और वह महाशक्ति जिसने सारी दुनिया को बनाया है उसका भी तो इस दुनिया में कोई बजूद है। फिर उसके माध्ययम जो भी हों, उसके द्वारा निर्धारित लोग जो भी हो। मगर सबका रास्ता प्रकृति की ओर ही जाता है जो समस्त प्रकृति उसमें मौजूद जीव, संरचनाऐं तथा खुशहाल जीवन के लिए इन्सानियत, उनका संरक्षण, सुरक्षा का कत्र्तव्य वोध कराता है। जिसे हम परम-परमात्मा कहते है। मगर इस सच को विसार कुछ लोग सत्ता के मद में चूर है, कि खुलेयाम इन्सानियत को गाली दे, मानवता को कलंकित कर उसे कुचलना चाहते है। 

जिसकी इजाजत न तो मानवता, इन्सानियत और न ही हमारा महान संविधान लोकतंत्र और प्रकृति देती है। 
निशंदेह प्रकृति स वत किसी राष्ट्र के निर्माण, उसकी पहचान और प्राकृतिक सिद्धान्तों के  पालन में कुछ  बाधा हो सकती  है। मगर अन्त नहीं।  आज इन्सानियत को गाली दे, सत्ता में बने रहने या सत्ता प्राप्ति के लिए जो फसल बोई जा रही है वह राष्ट्र ही नहीं, प्रकृति विरुद्ध भी जघन्य अपराध है, जिसकी भरपाई करने में आने वाली पीढ़ी भी शायद स्वयं को अक्षम समझें। 

बेहतर हो कि वोट के नाम और सत्ता की खातिर अनावश्यक प्रलाप राजनीति में अब बन्द होना चाहिए। ऐसे राष्ट्र व राज्य के हर नागरिक का कत्र्तव्य होना चाहिए कि वह स्वयं से निकलकर राष्ट्र, समाज, इन्सानियत, मानवता, प्रकृति के लिये सोचे बरना चन्द लोगों की मण्डली फिर चाहे कोई दल, वर्ग, जो भी हो, या फिर धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र के नाम विभक्त लोग हो। मगर सत्य सक्षम और अक्षम लोगों के बीच सन्तुलन की बांट जो रहा है। बेहतर हो हम प्राकृतिक सिद्धान्त का पालन कर इन्सानियत,  मानवता के लिये कार्य करें, जिससे हमें ही नहीं हमारी आने वाली पीढ़ी को भी खुशहाल जीवन नसीब हो सके। 
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