भावनाओं के देश में जबरदस्त सम्भावना...?

व्ही.एस.भुल्ले/तीरंदाज
भैया- काश हारे पर भी अकूत दौलत कुटी होती, तो हारी स भावनायें भी भावनाओं के देश में जबरदस्त बढ़ी होती, फेसबुक, ट्यूटर, ब्लॉकर, बेवसाइड एवं वॉट्सएप, बोर्ड होर्डिंग, पर्चे, किताब, पै पलेट, टी.व्ही., अखबार, चिन्दी, पन्ने सब में हारी फोटो चल रही होती, और स्वार्थ से सने समाज में पैदा होने वाले अनन्य अन्ध भक्तों के सहारे हारी महानता भी सर चढ़ कर बोल रही होती, मगर कै करुं फिलहाल दोनों ही शेष स भावनाओं का सफाया पढ़ा है। और स भावनाओंं का हारा महान देश फिलहाल उस्तादों से पटा पड़ा है। 

भैये- 100 फीसदी एफ.डी.आई. और हन्ड्रेड परसेन्ट राष्ट्रभक्ति के माहौल में तने कौन-सी स भावनाओं को ढूढ़ रहा है और बेवजह ही हारी चमकाऊ तकनीक पर कालिख पोत रहा है आखिर तने कै कहना चावे। 

भैया- मने तो बोल्यू एक समय तो भाग्य का जन्म के साथ ही जाता रहा। काश जन्म से ही दौलत हारे भाग्य में होती तो हारी रुह भी किसी टाटा, बिड़ला, अ बानी, अडानी के यहां पैदा हुई होती या फिर किसी निशंतान कुबेर पति के यहां गोद ली गई होती, सो भाया फिलहाल अब तो कर्म से ही भाग्य को अन्तिम आसरा बचा है। सो कर्म में स भावना तलाश रहा हूं और कुछ स्वार्थी तो कुछ अन्धे भक्त उस्तादों के बीच कत्र्तव्य पालन की कोशिस कर रहा हूं। काड़ू बोल्या काश तने जीव-जन्तु जानवर, पशु-पक्षी, वृक्ष इत्यादि के बीच स भावना तलाशता तो अभी तक तो हारा और थारा दोनो का कल्याण हाथों हाथ हो लिया होता और एक खुशहाल भू-भाग, राष्ट्र और समाज का निर्माण हो लिया होता। मने जानू कि पेड़-पौधे वृक्षों को पानी दे संरक्षण देगें तो वह जीवन दायनी स्वच्छ हवा, पानी और सुन्दरता देगें और अपनी जन्म दाता प्रकृति की रक्षा करेगें वहीं पशु-पक्षी, जानवर भी हर दिन अपने कत्र्तव्य का निर्वहन कर प्रकृति की रक्षा कर, जीवन निर्वहन करेगें वह भी नैसर्गिक गुणों को  छोड़ कभी हिन्सा नहीं करेगें, खासकर जननी जगत के खिलाफ बिल्कुल भी नहीं, फिर स्थितियाँ जो भी हो, मगर इसके उलट हिंसा मानव जगत में मची उसे देख मने तो कलेजा मुंह को आवे। 

भैये- तने तो वावला शै कै थारे को मालूम कोणी तने विश्व के  महान भू-भाग लोकतंत्र, जनतंत्र वाले देश में जी रहा है।  जहां भावनाओंं की इतनी अकूत दौलत है कि अक्रान्ता भी सैकड़ों वर्षो की लूट-पाट के बाद हार लिये, और इस देश  से भी ल बे हो लिये। अब तक आजादी से लेकर आज तक का सफर भी भावनाओं के सहारे कट लिया और स भावना तलाशने वालो को भी जीता-जागता लूट का ठिया मिल गया, फिर वह लूट जनधन की हो या फिर भावनाओंं की, थारे को क्या। 

भैया- मने समझ लिया थारा इशारा कि 100 फीसदी विदेशी निवेश से देश में मोटा धन आने वाला है, चमकाऊ तकनीक, चन्द स्वार्थियों और संगठित साथियों तथा अन्धे ाक्तों के सहारे अब राज ल बा चलने वाला है, सो स भावना तो गजब की है, मगर मेरी मातृ भूमि भी अजब की है। जय हिन्द.................?                              

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