भारत जैसे देश में नये-नये प्रयोग खतरनाक, क्या हम पुन: गुलामी को बढ़ावा दे रहे है

विलेज टाइम्स। देश में ग्लोबलाइजेशन के नाम मजबूत अर्थ व्यवस्था के प्रयोग जिस तरह से विगत 20 वर्ष से हो रहे है उससे तो यहीं लगता है कि हम एक मर्तवा फिर से गुलामी की ओर बढ़ रहे है। जिस देश में आधे से अधिक आबादी अशिक्षित 25 फीसदी के लगभग अजागरुक हो जहां विज्ञापनों के सहारे मार्केट बनते हो और लगभग न्याय पाने हर व्यक्ति को विधि विशेषज्ञों लगते हो, जाने अनजाने में कानून समझने वालो की खासी तादाद और कानून की आड़ में लुटने वालो की ल बी फौज हो, जहां एक बड़ी आबादी को स्वयं के ज्ञान, संरक्षरण पर जिन्दा रहना होता हो, ऐसे में निरीह प्राणियों के बीच नये-नये प्रयोग क्या दिशा इस देश को देगें समझ से परे है बैवजह देश की सडक़ों पर बढ़ते वाहन, ग भीर बीमारियों की ओर बढ़ती जनरेशन और आर्थिक सुरक्षा बीमा, संचार, बिजली, दिनदर्शन के नाम ग्लोबइजेशन के दौर में लुटते लोगों को बचाने में अक्षम हमारी एजेन्सियां उन क पनियों से कैसे देश के  नागरिकों संरक्षण और डूबते उघोगों को सहायता कर पायेगी जो धीरे-धीरे बन्द हो उत्पादन क्षेत्र से बाहर या फिर प्रतिस्पर्धा करने में अक्षम साबित हो रही है। 

उत्पादन से इतर दलाली, कमीशन की ओर बढ़ाता बाजार शायद अब व्यापार न होकर उपभोक्ताओं के लूट के बाजार बनते जा रहे है। क्योंकि इन्हें संरक्षण के लिए पर्याप्त कानून और विज्ञापन, बाजार मौजूद है देश में आज भी निचले स्तर पर उपभोक्ता, सरंक्षण की कोई ऐसी ऐजन्सी नहीं बन सकी जो तत्काल लुटते उप ाोक्ता को राहत दिला सके। और  उपभोक्ता को संरक्षण तथा कीमत अनुरुप गुणवत्ता पूर्ण वस्तुये मुहैया करा सके। 

कौन नहीं जानता बीमा के क्षेत्र में लायसन्स ले पॉलिसियाँ बैचने वाली क पनियों ने देश के गरीबों से लाखों करोड़ रुपया वर्ष 2011-12 तक किस कदर लूटा है, मगर सब चुप है, आखिर क्यों? 
40 प्रतिशत राशि का कटौत्रा करने वाली इन क पनियों को उपभोक्ता फोरमों से क्लीन चिट मिल रही है। 
संचार क्षेत्र ही नहीं, दिग्दर्शन के क्षेत्र में एक मुश्त राशि लेने के बाद कैसी घठिया सेवाये मिल रही है, कौन नहीं जानता। 
बिजली जैसा क्षेत्र किस कदर गरीब उपभोक्ता को कीमत के नाम सरेयाम लूट, घटिया सेवाऐं दे रहा है और बिजली क पनियों को मिले कानूनी संरक्षण के आगे गरीब उपभोक्ता कलफ रहा है। यह हकीकत तो देशी क पनियों की है।  
अगर विदेशी क पनियाँ भी किसी भी क्षेत्र में कूदी तो रोटी, कपड़ा, मकान को मोहताज इन्सान का क्या हाल होगा अन्दाजा लगाया जा सकता है। 
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