विधि विरुद्ध मुख्यमंत्री के बोल, सियासत में स्वाहा होती शपथ

व्ही.एस.भुल्ले/मप्र जून 2016।  खबर कितनी पुष्ट है या अपुष्ट है यह तो लिखने वाले ही जाने, मगर मप्र में महु की सभा के बाद यह दूसरा मौका था जब दूसरी मर्तवा किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा सबके साथ समान व्यवहार, न्याय की शपथ लेने वाले प्रदेश के मुखिया ने, एक वर्ग को खुश करने यह तक कह डाला कि कोई माई का लाल मेरे रहते आरक्षण खत्म नहीं कर सकता। 

ये सही है कि अगर संविधान और कानून में आरक्षण का प्रावधान है तो संविधान कानून विरुद्ध कार्य करने की हिमाकत कौन कर सकता है। जबकि सरकार स्वयं माननीय की हो और विधानसभा में पूर्ण बहुमत हो। 

मगर जिस मामले में स्वयं न्यायालय व्यवस्था दे चुका है तो उसके आगे भी न्यायालय है फिर मु यमंत्री जी को ऐसा अचानक क्या आ ाास हुआ कि उन्हें आन्दोलित लोगों के बीच जाकर दोहराना पड़ा कि कोई माई का लाल आरक्षण खत्म  नहीं कर सकता, बहरहाल सच जो भी हो। 

मगर इन चर्चाओं के बाद जो चर्चायें आरक्षण को लेकर गांव गली मोहल्लों में है उससे एक बड़ा वर्ग आहत है उनका कष्ट सिर्फ इतना है कि किसी वर्ग की उदारता और देश भक्ति को किसी भी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा आतंकित नहीं करना चाहिए। और फिर पद ग्रहण करने से पूर्व संवैधानिक शपथ भी तो कोई चीज होती है। उसके स मान को भी सियासत के लिये दर किनार नहीं किया जाना चाहिए, जबकि वह किसी संवैधानिक पद पर बैठा हो, ऐसा करना उस व्यक्ति के लिये बिल्कुल भी नैतिक रुप से उचित नहीं। फिलहाल तो व्यान को लेकर चर्चायें सरगर्म है और एक बड़ा वर्ग आहत। देखना होगा कि सत्ता के लिये दिये जाने वाले व्यान आखिर राजनीति की कौन सी दिशा और दशा तय करते है। 
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