सिद्धान्त, संस्कार विहीन भीड़ खतरनाक, सड़कों पर पसरी अराजकता

विलेज टाइम्स। अगर बेसुमार ताकत धन और साम्राज्यवादी सत्ता ही खुशहाली का माध्ययम है तो हमें हमारा इतिहास नहीं भूलना चाहिए तथा जो लोग, धर्म, जाति, भाषा के नाम ताकत, धन और सत्ता में भागीदारी चाहते उन्हें भी समझ लेना चाहिए कि वह ऐसा,  साम, नाम, दण्ड, भेद की नीति अपना कभी न कभी अपने इरादों में सफल तो हो सकते है। मगर सुकून खुशहाली कदापि नहीं पा सकते और न ही किसी को दे सकते। 

जिस तरह से कुछ लोगों ने धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र के नाम अपनी राजनैतिक  दुकाने खोल रखी है उससे अराजकता अन्याय, अत्याचार तो बढ़ सकता है मगर खुशहाली नही आ सकती। क्योंकि सिद्धान्त, संस्कार विहीन अंधे भक्तों की फौज स्वार्थ बस उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही है अपनी-अपनी राजनैतिक दुकानें धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र की दुहाई दे भारतीय स य समाज में ऐसी-ऐसी परिपाटी भोले भाले लोगों के बीच डाली जा रही है जिसका मार्ग सिर्फ और सिर्फ विद्वेष अराजकता और विनाश की ओर जाता है। 

मगर हमारा दुर्भाग्य यह है कि हम हमारी महान संस्कृति को तिलांजली दे अपने-अपने अन्धे स्वार्थो की खातिर क्या जायज क्या नाजायक, पढ़े लिखे, समझदार होने के बावजूद स्वीकारते हुये इसे बढ़ावा देते जा रहे है। 

हमारी स यता संस्कृति का इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है कि तथ्यविहीन अतार्किक बातों को लेकर केवल स्वार्थो की खातिर नये-नये जुमले बनायें जाते है यहीं नहीं बगैर सोचे समझे आरोप प्रत्यारोप तक लगाये जाते है। 

बढ़े अफसोस का विषय है कि हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में न तो हमारे संवैधानिक पद ही अब इन आरोप-प्रत्यारोपों से सुरक्षित है न ही उन पदो को सुशोभित करने वाले महान पुरुष की ब शे जा रहे है, जिन्होंने सारा जीवन देश व मानव जाति के लिये समर्पित कर दिया या कर रहे है।  

अभिव्यक्ति की आजादी के नाम आज इस कदर होड़ मची है कि एक दूसरे का मान-स मान तो दूर की कोणी अब तो इन्हें देख ऐसा लगता है कि अब हमारे संस्कार ही नहीं हमारी स यता, संस्कृति भी मानों ओझल होती जा रही है। 

एक दूसरे से अधिक महान संस्कारवान बनने, कहलाने की होड़ ने एक ऐसा माहौल खड़ा कर दिया है, जिसमें सभी बौने नजर आने लगे है। 

यहां तक कि अब लोग अभिव्यक्ति की आजादी के नाम उस त्याग, कुर्बानी पर भी उंगलियां  उठाने से नहीं चूक रहे जिनका इस देश या देश की आवाम की खुशहाली में एक बड़ा योगदान रहा है। 

जो सत्ता में है वोट की खातिर सच बोलना नहीं चाहते, जो सडक़ पर है या धर्म, भाषा, क्षेत्र के अन्धे भक्त है अगर सत्ता में नहीं तो सारे संस्कारों को तिलांजली दे, सत्ता को, सत्ता हथियाने के लिये गरियाना चाहते है जो देश ही नहीं देश की खुशहाली के लिये खतरनाक है। 
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