संवेदनहीन सियासत से जिन्दगी की उम्मीद

विलेज टाइम्स। संवेदन शून्य सियासत, झूठे सब्ज बागों के सहारे, सत्ता तक तो ले जा सकती मगर लेागों के दिलो में सम्मानित व स्वीकार्य स्थान नहीं दिला सकती क्योंकि आज की राजनीति में सक्रिय वे धन और पद लोलुप, अहम, अंहकारियों को सत्ता के बेहतर सौदागर तो बना सकती है। मगर एक समर्पित संगठन नहीं बना सकती। 



क्योंकि सत्ता के लिये अपने-अपने स्वार्थो के सहारे कुछ साथी तो कोई भी संस्था नफानुकसान के फारमूले और अपनी-अपनी जगह सुरक्षित जगह चाहने वालो के सहारे तिकड़म लगा सकती है मगर जीवन्त संगठन, कद्दावर नेतृत्व और जनता के दिल में जगह नहीं बना सकती। 

यहीं दुर्भाग्य देश के उस महान संगठन का है, जो जीवन्त लोगों के बीच निर्जीव सा हो चला है चापलूसी जबानी जमा खर्च के सहारे अपना-अपना स्थान, संगठन सत्ता में ही सुरक्षित नहीं बल्कि विरोधी दलो में स्वयं की सार्थकता जता अपने स्वार्थ सिद्ध करने वाले आज भी इस मुगालता में है कि जिस महान संगठन का नेतृत्व, महात्मा गांधी सुभाष बाबू, शास्त्री, इन्दिरा जैसी जीवट महान व्यक्तित्वों ने किया हो, जिस विचारधारा ने अंग्रेजो को इस देश से खदेड़ा हो। वह इस तरह की राजनीति से ध्वस्त हो जायेगी, अगर कुछ लोग ऐसा सोचते है तो वह गलत है। 

क्योंकि कॉग्रेस एक जीवंत संगठन रहा है जिस की अनुभूति आम गरीब के दिल में रहती थी मगर कहते है दिल में जान होती है अगर ऐसे दिल को निर्जीव शरीर में ट्रान्सप्लान्ट कर दिया जाये तो वह भी दम तोड़ देगा, जैसा कि काँग्रेस के कुछ नेताओं ने बना रखा है। मगर कॉग्रेस के अन्दर इसी तरह के प्रयोग विगत कुछ वर्षो से चल रहे है और दोष उस व्यक्ति के सर मड़े जा रहे है जो इसके लिये कहीं से कहीं तक दोषी ही नहीं। 

मजबूरी उस युवा व्यक्तित्व कि यह है कि उसने उस कुलुषित राजनीति का ककहरा ही नहीं पढ़ा, जो वर्तमान में प्रचलित है न ही उन रणनीतिकारों ने पढऩे दिया जिनकी राजनैतिक दुकाने बन्द हो सकती थी। 

किसी भी महान देश में किसी संगठन या राजनीति इतनी स्वार्थी और असहाय हो सकती है जिन्हें देश की जनता को बैवकूफ बनाने नई-नई संवदेनहीन निर्जीव तकनीक एजेन्सियोंं की जरुरत पढ़ जाये, एक-दो लोगों को सफलता क्या मिली कि भाई लोग उस व्यक्ति को अलाउद्दीन का चिराग समझ, देश प्रदेश की सत्ता का रास्ता सुनिश्चित करना चाहतेे है। अगर जो लोग ऐसा समझते है तो उन्हें सावधान हो जाना चाहिए कि यह उस महान देश के महान नागरिकों की सहनशीलता की पराकाष्ठा की इतनी बड़ी परीक्षा न ले, क्योंकि इतिहास गवाह है कि समय-समय पर जनभावनाओं ने  अच्छे-अच्छे सूरवीर को इसी धरा पर अपने आक्रोश के चलते धरासायी किया है तो ऐसी संवेदनहीन तकनीक फिर किस खेत की मूली। 

मगर दुर्भाग्य कि देश के आम नागरिक का, कि मंहगे होते चुनावों में, वह अब सेवा के नाम वोट तो दे सकता है मगर बगैर किसी ऐसे कुबेरपतियो, दल के सहारे वह चुनाव लड़ नहीं जीत सकता, न ही उसकी इतनी ऐसियत कि वह लाखों रुपये चुनाव जीतने खर्च कर सके है। 

बेहतर हो कि लोग निर्जीव होती देश की राजनीति में जान फूक जीवंत तकनीक तलाशने का कार्य कर लोगों के दिलो में स्थाई जगह बना एक स मानित आचरण प्रस्तुतद करें।  बरना कहते है काठ की हांडी सिर्फ एक बार ही चढ़ती है बार-बार नहीं। 
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