लोक पर भारी तंत्र, जय हो जनतंत्र...

व्ही.एस.भुल्ले @तीरंदाज
भैया- मने तो पहले ही बोल्या, गर होती हारी भी सरकार, तो पूरे 5-10 नहीं 100 वर्ष तक विपक्ष विहीन सरकार चलाता और निक मे कार्य कत्र्ताओं के रहते तंत्र के अन्दर ही एक मजबूत समृद्ध दल बनाता, बिकाऊ मीडिया को भी लाख 50 हजार के मिलने वाले विज्ञापनों की जगह, एडवांस में ही मुंह बन्द रख यसोगान करने के बदले लाखों करोड़ों के चैक हाथो हाथ बटवाता, इतना ही नहीं हैसियत अनुसार  किसी को कोणी मोल जमीन, तो किसी को उघोग और किसी को जनता केे धन के लूटमार के माध्ययम बने निगमों से उधार का रिण तथा लाखों करोड़ोंं की छपाई सप्लाई के वर्क ऑर्डर दिलवाता।  फिलहाल तो भाया मने विपक्ष की माली हालत देख रोना आवे। मगर कै करुं खाने  कमाने और वंश बढ़ाने वालो सहित बौद्धिक जुगाली कर साहित्यिक अययासी कर अपना कत्र्तव्य निभाने वालो पर तरस आवे। क्योंकि भाई लोगों की तो चकाचक चल रही है इतना ही नहीं इस मर्तवा तो, चौथी बार सरकार बनाने 4 वर्ष पूर्व से ही तैयारी चल रही है। 


भैये- तने तो बावला शै कै थारे को मालूम कोणी, अब तो हर चिल्लाने वालो को जमकर बट रहा है। चूजा-चूजी, अन्डी बच्चे से लेकर इस बटोने से कोई नहीं छूट रहा है। भाई लोगों का तो प्रयास है कि कीमत जो भी हो सत्ता का कारवां ऐसे ही बढ़ता जाये और सारे देश में एक दिन जैसा ही ध्वज लहराये। 

भैया- मगर लोकायुक्त आर्थिक अपराध में पकड़े जाने वाले हारे तंत्र में पार्टी के अघोषित नेता, कार्यकत्र्ता, प्रबंधक, पदाधिकारियों का कै होगा जिनके यहां लाख-दो लाख नहीं करोड़ों निकल रहे है। और सरकार के  इन अन्धे भक्तों को चोर भ्रष्ट के सार्वजनिक तमगे बट रहे है। कै थारे को मालूम कोणी जब कोई जलसा भीख, भाषण, भण्डारे को लेकर होता है तो इन्हीं का सारा कुनवा तो ही व्यवस्था में जुटा होता है, जरुरत पढऩे पर भण्डारा भी इन्हीं के चन्दे से जनता जनार्दन को होता है। काड़ू बोल्या अब तो पार्टी के भाई लोगों की जरुरत मंच की शोभा बढ़ाने तक सीमित है। असल जबावदेही तो अब इन अघोषित पार्टी के तंत्र में मौजूद इन्हीं अन्धे भक्तों की है। 

भैये- इकला चलो रे के नारे के साथ अगर गांधी जी के तीन बन्दरों वाली कहावत जोड़ दी जाये कि न बुरा बोलो, सुनो, देखों और मसक के पैलो, तो बुराई ही क्या? और बसुधैव कुटु बकम की भावना पर जो हमला बोले उसे बसुदेव कुटु बकम की भावना से कुचलो तो हर्ज ही क्या? 

भैया- मने समझ लिया थारा इसारा, मगर कै करु जब बड़े-बड़े सूरवीर, राजे, रजबाड़ों के गुरुर इस टिड्डी दल, के आगे अचेत हो चकना चूर पड़े हो, तो हारे जैसे चिन्दी पन्ने वालो की औकात क्या जो भाई लोगों को आयना दिखा सके। जिस सरकार में भ्रष्ट, ड्रायवर, फोटो ग्राफर, बाबू, चापलूस, अधिकारियों के रहते खबरची को मिलने वाला वर्ष भर का मुनादी पट्टा तक छीन स्वाभिमानी राष्ट्र भक्त चिन्दी पन्नों वालों पट्टा छीन लेते हो तो ऐसी व्यवस्था से थारे हारे जैसे लोगों को ज्यादा इन्सानियत की उ मीद भी नहीं करनी चाहिए। मगर भारत के अन्तिम बादशाह के अन्धो भक्तों ये मत भूलो यह भारत की वह महान भूमि है, जहां आंधी, तूफान, जलजले भी आते है और बड़े-बड़े सिंहासन भी, देखते ही देखते एक ही झटके मेंं धरासायी हो जाते है।  फिर इस देश में मुगल, अंग्रेज, शासक भी तो रहे है, या फिर कॉग्रेस के भी वर्षो दिये जले है सबका अपना-अपना  इतिहास है थारे को यह नहीं भूलना चाहिए कि यह लोकतंत्र है, मने तो बोल्यू इस लोकतंत्र में अघोषित जनाकांक्षाओं का दमन तो हो सकता है मगर दमनकारियों का शासन इस पवित्र भूमि पर ज्यादा दिन तक नहीं टिका है सकता है।  
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