कब तक षडय़ंत्रों का शिकार होगी शिवपुरी

व्ही.एस.भुल्ले/विलेज टाइम्स, शिवपुरी म.प्र. अप्रैल 2016। बड़े ही शर्म की बात है 21वी सदी की इस शिवपुरी को जहां के लेाग गन्दे बर्षाती नालो से गुजर चांदपाठे में इकट्ठे होने वाले पानी से जीवन निर्वहन करना पढ़ रहा है या फिर बगैर परीक्षण बोर बैलो से सप्लाई होने वाला पानी पीना पढ़ रहा है अब जबकि चाँदपाठा सहित बोर तक जबाव देने लगे है। 


ऐसी स्थिति में प्रशासन ने बारिश के जल को सजोने की स्कीम फिफटी-फिफटी खर्चे पर बनाई है वह भी वाटर हारबैस्टिंग के जरिये जिसकी शुरुआत समाज सेवी संस्था रोटरी से कराई गयी है। आव्हन ये भी है कि अगर और भी कोई संस्था, समाज सेवी संगठन यह कार्य करता है तो शहर के लिये उसका यह अविस्मणीय कार्य होगा जिसे एक्सपर्ट विभाग तकनीकी मदद मुहैया करायेगें। 

निश्चित ही एक दुर्भाग्यशाली शहर को इससे बड़ी राहत की बात क्या होगी कि विगत 25 वर्षो में बड़ी बेरहमी से शहर की जमीन को छेद भूमिगत जल भण्डार को लगभग 1000 बोर जाप्ते में और सेकड़ों बोर प्रायवेट से उलीच उपयोग करने वाले शहर को प्रशासन नहीं पानी सजोने की शुरुआत भी समाजसेवी संस्था को इस आव्हन के साथ करना पड़ रही है कि जागो फिर एकंबार। 

मगर यक्ष प्रश्र यहां यह है जल स्तर बढ़ेगा कैसे? तो फिलहाल वॉटर हारबेस्टिंग नाम की तकनीक अलाउद्दीन के चिराग की तरह है। जो फिलहाल शिवपुरी शहर वासियों के सामने है जिसके तहत छतो के पानी को शॉकपिट बना जमीन के अन्दर पहुंचाया जा सके। या फिर पुराने कुये बाबडिय़ों का जीर्णोउद्दार और कोई नया तालाब या फिर एक मात्र मनीयर तालाब को भर कर बढ़ाया जो सकता है जैसा कि शासन के तकनीकी विशेेषज्ञों का कहना है। 

अगर हम 5000 की जनसं या वाले शहर को 25000 की जनसं या के लिसे घनो जंगलों से घिरे पठारी क्षेत्र में बसाय गसे शहर के लिये इतनी सारी मशक्कत कर रहे है और पूरी निष्ठा ईमानदारी के साथ भला सोच रहे है तो यह बगैर रोड मैफ के कैसे स भव हैं। क्योंकि किसी भी समस्या समाधान के लिये गहन चिन्तन के साथ उसका धरातलीय आंकलन आवश्यक होता है। 

लगभग एक बाई एक किलो मीटर रेडियस वाले लगभग 90 वर्ष पुराने यह शहर तीन बाई तीन किलोमीटर रेडियस में फैल चुका है। जिसमें घोषित अघोषित तौर पर 2 लाख के लगभग लोग रह रहे है। 

25000 की आबादी के लिये पेयजल व भू-जल स्तर बनाये रखने लगभग छोटे बड़े 14 तालाब थे जिसमें से पूर्ण क्षमता वाले मात्र दो ही शेष है। बाकी या तो वह भरने लायक नहीं या फिर बड़े पैमाने पर राजस्व विभाग के कुछ कर्मचारी अधिकारी और भूूमाफियाओं द्वारा कालोनियाँ कटवा ठिये ठिकाने लगा दिये। जहां लेागों के मकान दुकान बने हुये है। 

तो स्वभाविक है कि और अधिक तालाबों तो बन नहीं सकते क्योंकि जगह नहीं, जो तालाब मिटा गये, वह मजबूत है जिन विचारों ने गाड़े पसीने से कमाई कर घरौंदे खड़े किये है वे ही पुराने तालाबों के नाम शेष है। अगर ऐसे में वॉटर हारवेस्टिंग का कान्सेप्ट  ही मुफीद है जो समजा सेवी संस्थाओं को करना है। शासन को मात्र तकनीकी मार्गदर्शन या फिर आधी राशि खर्च करने वाली संस्था को आधी राशि शासन से देना है। 

देखना होगा कि समाजसेवी संस्थाओं की यह मुहीम कितनी काम आयेगी क्योंकि आज से 8-10 वर्ष पूर्व भी जब यहां डॉ.एम गीता कलेक्टर और जगमोहन सेंगर नगरपालिका अध्यक्ष थे तब बड़े पैमाने पर शासकीय जनता का धन सारे शासकीय विभाग स्वयं नगरपालिका ने लाखों करोड़ों खर्च कर वॉटर हारबेस्टिंग शासकीय कार्यालय सहित शहर भर में कराई थी जिसका नामों निशान तक नहीं तब वॉटर लेवल 250-300 था आज 900 फीट तक जा पहुंचा। बहरहाल कहते है आशा पर आसमान टिका है तो न उ मीद कैसी। जल है, तो कल है .......................?
SHARE
    Your Comment

0 comments:

Post a Comment