खुशहाल जीवन के लिये अहम है उसकी अनुभूति, न कि जुबानी जमा खर्च

मप्र विलेज टाइम्स। जिस तरह से जीवन के लिये संघर्ष करते करोड़ों लेागों के बहुमूल्य खुशहाल जीवन को महात्वकांक्षाओं की पूर्ति हेतु, उनके जीवन को प्रयोगशाला समझ विगत वर्षो से प्रयोग पर प्रयोग किये जा रहे है वह अभी तक जुबानी जमा खर्च से ज्यादा कुछ साबित नहीं हो सके। 


हालात यह है कि नई-नई योजनायें नये-नये क्रियान्वयन के प्रयोगो ने लोगों के जीवन को नरक बनाकर छोड़ दिया, न तो अब इन योजनाओं को क्रियान्वित करने, कराने वालों को पता कि कितनी योजनायें चल रही है न ही उन्हें पता जिनके के लिये यह योजनायें चल रही है। नित नये ढंग से योजनायें बन बिगड़ रही है और स्थापित संरचनात्मक ढांचा ध्वस्त होता जा रहा है, न तो किसी को योजना की गुणवत्ता का पता है, न ही होने वाले लाभों से हितग्राहियों का भला हो रहा है। 

तेजी से परवान चढ़ती महात्वकांक्षाओं की इस आंधी दौड़ में सब कुछ चौपट हो चला है अब न तो क्रियान्वयन कत्र्ता ही कत्र्तव्यनिष्ठा निभा पा रहे है, न ही लेाग उन कार्यो को मूर्त रुप लेतेे उनका देख लाभ उठा पा रहे है। 

ऐसे में खुशहाल जीवन की कल्पना मात्र दिवास्पन के समान दिखाई देती है और उस सुख की अनुभूति काफुर दिखाई पड़ती है जिसका जुबानी जमा खर्च पर सरकारे ही नहीं अच्छे-अच्छे नेता, दल इठलाते नहीं थकते और आम जनता या फिर निरीह प्राणी इस उ मीद में है, कि शायद अब उसके अच्छे दिन आयेगें, आज नहीं तो कल, वह महात्वकांक्षाओं की बिना पर हो रहे प्रयोग और अनावश्यक जुबानी जमा खर्च से अवश्य निजात पायेगें। देखना होगा कि आने वाले समय में व्यवस्थागत संस्थाओं का आम व्यक्ति के खुशहाल जीवन के लिये भावी पैमाना क्या होगा?  
SHARE
    Your Comment

0 comments:

Post a Comment