मप्र में कलफते मजदूरों के शोषण का खुलासा

विलेज टाइम्स। गांवों में मौजूद गरीब, मजदूरों को शुुरु की गई मनरेगा में म.प्र. 1100 करोड़ के विलम्बित भुगतान में से 600 करोड़ रुपये मजदूरी ...

विलेज टाइम्स। गांवों में मौजूद गरीब, मजदूरों को शुुरु की गई मनरेगा में म.प्र. 1100 करोड़ के विलम्बित भुगतान में से 600 करोड़ रुपये मजदूरी का भुगतान शेष है। जैसा कि आजकल अखबारों की सुर्खियों में है वहीं नक्सलियों ने संरपंचो को निर्धारित समय सीमा में मजदूरों को भुगतान या सरपंची छोडऩे की धमकी दे रखी है। जिनकी रिपोर्ट वालाघाट जिला व पुलिस प्रशासन ने म.प्र. सरकार को भेज दी है। अगर खबरों कि ही माने तो इस धमकी को लेकर सरकार भी हरकत में है, केन्द्र से 1500 करोड़ न मिलने की स्थिति में वह अपने स्तर पर भी भुगतान करने का मन बना रही है। 


मगर इस सबके बीच यह स्पष्ट है कि विगत डेढ़ वर्ष से सरकार म.प्र. के मजदूरों से झूठ बोल रही थी और नौकरशाह सरकार की मंशा अनुसार चुप बैठ, नियम कायदों का दिलाशा दे, मजदूरों को पलायन करने पर मजबूर किये जा रहे थे। 

मगर जब यह खुलासा हो ही चुका है कि केन्द्र से उसे 123 करोड़ के अलावा विगत वर्षो में एक छदम तक नहीं मिला। ऐसे में म.प्र. के ग्रामीण क्षेत्रों में गरीब, मजदूरों की माली हालात का अन्दाजा लगाया जा सकता है। 

मगर यहां यक्ष प्रश्न यह है कि यूपीए सरकार में कार्यो की पूरी राशि मिलने के बावजूद धरने पर बैठने वाले मु यमंत्री अभी तक केन्द्र की मजदूर विरोधी सरकार के खिलाफ धरने पर क्यों नहीं बैठेे? बल्कि वह केन्द्र के मुखिया को भगवान का स्वरुप और न जाने क्या-क्या बताने से नहीं चूके एक वृहत कार्यक्रम में तो यहां तक कह गये कि केन्द्र से खूब मद मिल रहा है। आखिर कोई भी जन नेता प्रदेश का मुखिया प्रदेश की जनता से इतने बड़ा झूठ कैसे बोल सकता है। और वह तब जब उसकी लोकप्रियता सातवे आसमान हो?  

बहरहाल जब पोल खुली ही गयी है तो देखना होगा कि म.प्र. सरकार अब क्या कदम उठाती है या फिर धमकी के सामने  घुटने टेक  जाती है।  

 शिक्षा माफिया: बैवस लेाग, मजबूर सरकार 

देश भर में करोड़ों के बारे न्यारे करते शिक्षा माफियाओं के आगे देश के नागरिक तो बैवस है ही, अब तो सरकारे भी मजबूर नजर आती है। पूंजीबाद बाद की अन्धी दौड़ में तबाह होता देश का भविष्य भले ही राष्ट्रीय शिक्षा नीति और कारगार कानूनों के आभाव औधे मुंह पढ़ा हो, मगर सतत सत्ता और सत्ता विस्तार में डूबे शासकों को फुरसत कहा जो वह सभा, भाषण, उदघाटन, आरोप-प्रत्यारोप को छोड़ देश की शसक्त विकास उन्मुख शिक्षा नीति बना सके। 
शिक्षा के नाम शासकीय स्तर पर अरबों-खरबों फूकने वाली इन सरकारों का करोड़ों अरबों रुपया वेतन भत्ते व्यवस्था के नाम खर्च हो रहा हो मगर शिक्षा माफियाओं के दरवाजे आय दिन बढऩे वालो का जमघट दिन व दिन बढ़ रहा है। 
जिसके चलते देश-प्रदेश के बड़े-बड़े शहर ही नहीं नगर, कस्बो में शिक्षा के नाम माफिया अन्दाज में जमकर लूट मची है। कलफते पालक और सहमें बच्चों की तकलीफ सरकारों को चीखने चिल्लाने पर भी नहीं दिख रही है। 
कोर्ट कचहरियों में सरकारों को चुनौती देने वाले संगठित ये शिक्षा माफिया अब तो सरकारों पर ही भारी पढ़ रहे है। मुंह मांगी फीस, मंहगी किताब, ड्रेस के नाम खुलेयाम लूट रहे है। और बैवस लोग मजबूर सरकारों के रहते लुटने पर मजबूर हो रहे है।  
कारण साफ है खाला की सार बन चुके शासकीय विद्यालयों में शिक्षा का स्तर इस हद तक गिर गया है जिसके चलते जमकर माफिया राज पनप रहा है। 
और राष्ट्रीय शिक्षा नीति और कारगार कानून के आभाव में मनमानी शिक्षा देने का काँरवा चल पढ़ा है। कोई किसी विचार-धारा तो कोई किसी विचारधारा के वशीभूत हो, देश के भविष्य को पूंजीबादी वैचारिक साम्राज्य के लिये तैयार कर रहा है अगर हम अब भी न चैते तो हर स्तर पर लुटते ये नौनिहाल कैसा राष्ट्र बनायेगें, अन्दाजा लगाया जा सकता है। 

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