राजधर्म से मुंह मोड़ते लोकतंत्र के रहनुमा

व्ही.एस.भुल्ले। पैर पसारता अतिक्रमण, लुटता पानी, चेारी होती बिजली, सेवा के नाम मनमानी उगाही और सड़क पर होते फैसलो के बीच राजधर्म की बैवसी...

व्ही.एस.भुल्ले। पैर पसारता अतिक्रमण, लुटता पानी, चेारी होती बिजली, सेवा के नाम मनमानी उगाही और सड़क पर होते फैसलो के बीच राजधर्म की बैवसी वोटो की गुलाम और संवैधानिक संरक्षण प्राप्त संस्थायें और उनके चेहरे तमाशबीन की मुद्रा में कानून का राज कायम करने के बजाये तालियाँ ठोकने पर मजबूर नजर आते है।


आखिर एक महान व्यवस्था में ऐसी अराजकता क्यों? 
आज हमारी लेाकतांत्रिक व्यवस्था में यह सवाल यक्ष है कि इस महान व्यवस्था में अभी तक क्यों कानून का राज कायम नहीं हो सका और क्या कारण है जो कानून का पालन कराने राजधर्म मजबूर है। 
कारण साफ है स्वयं के स्वार्थ और वोट की राजनीति तथा दलीय विहिप में दम तोड़ती जनभावना व लोकतंत्र अब समय आ गया कि देश के हर नागरिक को स्वयं से बाहर निकल दलीय विहिप और लोकतांत्रिक व्यवस्था में पनपते पूंजीवाद की समीक्षा कर विचार करना होगा। कत्र्तव्य विमुख होते ऐसे व्यक्तियों पर जिन्होंने समाज ही नहीं दल, संवैधानिक संस्थाओं की छवि लेागों के बीच सुन्दर बनाने के बजाये कुरुप और निक मी बना रखी है। 
कत्र्तव्य विमुखता ऐसी कि चहुं ओर अराजकता पसरी पढ़ी है जिसे समेटने में अब तो लेाकतंत्र की हर संवैधानिक संस्थाओं के पसीने छूट रहे है। 

उदाहरण देश में बड़े कर्जदारों की भले ही ल बी लिस्ट हो बैंको का लाखों करोड़ डूबने के कागार पर हो, वहीं हजारों करोड़ डकार कई फरारी काट रहे हो।  मगर दूसरी कई संवैधानिक संस्थाओं का डन्डा बैंको के साथ पूरे जोर-शोर से गरीबों से लेकर अन्नदाताओं के साथ चलता है। यहां तक कि हजारों अन्नदाता कर्ज बसूली आत्महत्या तक कर जाते है। 

लाखों, करोड़ डकार शान से स्वयं को उघोगपति का तमगा लगाने वाले भी इस देश के नागरिक है और फसल, दुकान, मकान,वाहन के लिये लेने वाले भी इस देश के नागरिक है। सभी को इस लोकतंात्रिक व्यवस्था में एक-एक मत देने का अधिकार है, फिर देश के नागरिको के साथ बैंकों का नजरिया दोहरा क्यों?

इतना ही नहीं आर्थिक सुरक्षा के नाम 2007 से लेकर 2011-12 तक बीमा के नाम देश के गरीब नागरिकों से लाखों करोड़ की सुनियोजित कानूनन ठगी कर ली जाती है हिन्दी भाषी लेागों को अंग्रेजी में टंकित बीमा पॉलिसी, पेन्शन, प्लस के नाम, उन्हीं के नाते, रिश्तेदार, दोस्त, पहचान वालो के हाथों भावनात्मक ब्लैक मैलिंग करा हाथों हाथ थमा दी जाती है। और नियम कानूनों की आड़ में इस गरीब भोले भाले देश के नागरिकों से लाखों करोड़ रुपये की राशि लूट ली जाती है आखिर कैसे? बीमा के नाम प्रायवेट क पनियों द्वारा लाखों करोड़ रुपये की जघन्य लूट पर न तो आज तक कोई सत्ता पक्ष बोला न ही विपक्ष ने मुंह खोला, आज तो तब का विपक्ष स्वयं सत्ता में है, न ही उन नौकरशाहों ने मुंह खोला जो स्वयं को देश का सबसे बड़ा कानून का रक्षक समझते है। 
खैर बातें तो बहुत है ज्वलन्त मुद्दे तो वह है आज के जो हर स य नागरिक का जीवन नरक बनाये हुये है। जिसमें अहम पैर पसारता अतिक्रमण और लुटता पेयजल है, जिस पर से दबंगई से होती बिजली चेारी और अनियंत्रित, ट्राफिक व्यवस्था है। मौत के ताबूत के रुप में दौड़ते अनियंत्रित वाहन और वाहन या अग्नि समाधि लेते बसों में लोग, जरा-जरा सी बात पर होती हत्यायें इस बात की गवाह है कि व्यवस्था किस हद तक चौपट है। 

अस्तित्व खोदी सड़के, शासकीय भूमि, तालाब की भूमि, पानी अराजकता पूर्ण लूट के वो पनाह गाह है जो बताते कि हमारी संवैधानिक संस्थाओं को स्वार्थी, कत्र्तव्य विमुख जबावदेह लेागों ने कहा तक पहुंचा दिया। 
अब धर्म के नाम होने वाले अतिक्रमण और उनके अतिक्रामक धर्म की आड़ में अराजकता फैलाने से नहीं चूकते। ऐसे हालातों के बीच किसी भी स य नागरिक का विचलित होना स्वभाविक है। 

मगर कानून के रखवाले अभी भी कत्र्तव्य विमुख बन, उन स्वार्थी सत्ता, या विपक्ष का हुक्का भरने में मशगूल है जो इस अराजकता को बढ़ाने वोटो की खातिर मजबूर है शायद उन्हें गुगालता हो कि वह तो चाक चौबन्द व्यवस्था के बीच सुखी और सुरक्षित है। मगर यह गलतफहमी ज्यादा दिनों तक टिकने वाली नहीं। क्योंकि अब अराजकता का दायरा दिन दूनी, रात चौगुनी रफतार से बढ़ रहा है और जनसं या भी जबकि संसाधन धीरे-धीरे सीमित और समाप्त होते जा रहे है। 

बेहतर हो हमारे संवैधानिक संरक्षक, कत्र्तव्य विमुखता, स्वार्थ छोड़ इस महान देश और देश के महान लोकतंत्र को सुधारने की कोशिस तो शुरु करें, कामयाबी अवश्य मिलेगी और यह लेाकतांत्रिक कायनात भी सुन्दर सुखमय बन सकेगी। 

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तीरंदाज,328,व्ही.एस.भुल्ले,523,
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राजधर्म से मुंह मोड़ते लोकतंत्र के रहनुमा
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