महात्वकांक्षाओं का, महान देश से, मजाक खतरनाक

विलेज टाइम्स। खेत, खलियान, गांव, गरीब को छोड़ महात्वकांक्षाओं की पूर्ति हेतु इस महान जुबानी जंग के पीछे का सच क्या है यह तो नित नये ढंग से उछलने वाले मुद्दों को हवा देने वाले ही जाने या फिर वह धन लालची मीडिया वाले जाने जो इन महात्वकांक्षी लेागों का हथियार बन खेत, खलियान, गांव, गरीब के अहम मुद्दें छोड़ आय दिन जुबानी जंग का माहौल तैयार करते रहते है। और मजलूम निढाल गरीब, किसान पथराई आंखों से इस जुबानी जंग को देखते रहते है। ऐसे में मुद्दा विहीन जुबानी जंग देख लेागों में अनर्गल भय समाज में पैदा होता है। ऐसे व्यान और असुरक्षित माहौल में अलाल व्यवस्था दे ा लोग भौचक है।  

क्योंकि जब भी बेतरजीह जुबानी जंग किसी भी समाज  में खतरनाक रुप धारण करती है तो या तो आम गरीब, मजदूर, किसान कुये में कूद या फिर फांसी के फंदे पर झूल अपनी जीवन लीला समाप्त करता दिखाई देता है।  या फिर अराजकता का शिकार हो अपना सब कुछ गवां देता है।
मगर तब भी जुबानी जंग वालो का वाल भी वांका नहीं होता आखिर क्यों? यहीं यक्ष सवाल देश की अस्सी फीसद आबादी को डरा भय का माहौल बनाता रहता है। 

आखिर क्या गुनाह है देश के आम गरीब, किसान और इन्सानों का आखिर इन सभी लेागों ने या तो सत्ता या फिर विपक्ष को अपने खुशहाल जीवन जीने के लिये अपना अमूल्य मत दिया है। जिससे सत्ता और विपक्ष के लोग अपना शाही जीवन जी सके और आने वाली अपनी 7 पीढिय़ों का जीवन सुरक्षित खुशहाल बना सके, उसके लिये उसने पूरा मौका दिया है। फिर देश का नागरिक भययुक्त माहौल में भी देश के नौकरशाहों को आलीशान सुविधा और मोटा वेतन मिल सके उसके लिये भी टेक्स के रुप में धन देता है। 
बगैर पढ़े, बगैर समझे कानून की मोटी-मोटी किताबों में लि ो कानूनों पर अपनी सहमति दे रहा है। 

फिर ऐसा क्या अपराध हुआ देश के माननीय, श्रीमानों अभी तक तो नरकीय जीवन ही नसीब था तो भी वह कुछ शिकायतों के बावजूद सन्तुष्ट था जो वह अब भयभीत हो सुखद जीवन जीने के लिये, जीते जी तिल-तिल मर रहा है। माननीय, श्रीमानों अंगे्रज तो धन लूटते थे। उनकी अक्रंान्ता अत्याचारी और लुटेरों की एक पहचान थी। मगर आप तो हमारे अपने है फिर हम अपनों के ही बीच क्यों हैरान-परेशान आखिर वो कौन लोग है जिन्होंने हमारा अमन, चैन ही लूट लूट रखा है, आखिर क्यों? 

इतना सब कुछ करने के बावजूद आपने हमें आज जिस चौराहें पर ला खड़ा किया है, हो सकता है यह हम खेत, खलियान, गांव, गरीब का प्रारवध हो, अगर वाक्य में हम दीन-हीन परेशान लेागों का यह प्रारवध है। तो माननीय श्रीमानों हमारी परछाई भी आपका पीछा नहीं छोडऩे वाली नहीं। सो सभी कान खोल कर सुने ले समझ ले कि व्यक्तिगत, वैचारिक महात्कांक्षायें स्वयं का तो भला कर सकती, मगर किसी भी समाज और राष्ट्र का भला नहीं कर सकती। 
सो माननीय, श्रीमानों अपनी जबावदेही कत्र्तव्य निष्ठा पहचानों बरना कहीं जुबानी महा जंग में हम गरीब, किसान इन्सानों का शुकून न छिन जाये। 

वहीं देश के समझदार या न समझ नागरिकों को ऐसे बदजुबानी व्यान या आय दिन उठने वाले अहम मुद्दे से इतर बेमतलब के मुद्दों से स्वयं को अलग रखना चाहिए। और ऐसी मीडिया को न तो देखना, सुनना, पढऩा चाहिए जो अहम मुद्दें से इतर महात्वकांक्षियों का हथियार बन नागरिकों के बीच बेसर पैर के मुद्दे लाती हो, तभी हम एक महान देश के  महान नागरिक और शक्तिशाली खुशहाल राष्ट्र बन पायेगेंं और यही हर नागरिक की जबावदेही और कत्र्तव्य होना चाहिए। 
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