जुल्म की इन्तिहा है, जुलानिया जी: दबंगई के आगे दम तोड़ते बेजुबान


विलेज टाइम्स,मार्च 2016। मप्र में बेजुबान ही नहीं जुबान वालों के लिये पेयजल को लेकर इन्तिहा की घड़ी तो तभी शुरु हो ली थी जब पूर्ववर्त दिग्विजय सरकार ने जनाक्रोश से बचने पेयजल व्यवस्था नगरीय निकाय पंचायतों को सौंप दी और गांव-गांव मौजूद चरनोई की भूमि सत्ता में लौटने की खातिर हाथों हाथ ऐसे लेागो में बांट दी जिनका खेती-किसानी से दूर-दूर का वास्ता नहीं रहा, रही सही कसर जल उपभोक्ता समितियों के चुनावों ने कर दी। 

1980 के वन सरंक्षण अधिनियम के चलते पालतू जानवरों का वनो से नाता क्या तोड़ा गया, पालतू आवारा जानवर चरनोई तक सीमित ही रह गये। जो बाद में कृषि योग्य घोषित कर पट्टो के रुप में बांट दी गई शेष दंबगों द्वारा कब्जा ली गई। रहा सवाल पेयजल का तो जब से तालाबों पर जल उपभोक्ता समितियाँ क्या बनी, तालाबों के केच मेन्ट ऐरिया बड़े-बड़े कृषि फार्म और अवैध फसल उगाई के अड्डे बन गये। विगत 2-3 वर्ष से हो रही बेमौसम बारिश एवं अल्प वर्षा के चलते झील, झरने छोटे-मोटे तालाब भी दम तोड़ लिये। वहीं गांव-गांव घर-घर बोरिंग कल्चर से प्यास बुझाने के फॉरमूले भी 500-600 फीट तक जा पहुंचे जल स्तर के चलते धीरे-धीरे दम तोड़ लिये। ऐसे में इन्सान तो प्यास बुझा लेगा। नही हुआ तो शासकीय अमला परिवहन कर लेागों को बचा लेगा। मगर बेजुबान क्या करे, जिनके हक का पानी दंबग, खेती-किसानी में उड़ा गये तो कुछ तालाबों में ही ेाती कर पचा गये। 

हालात यह है कि प्यासे जानवर अब जाने अन्जाने में ही सही सूखी जल समाधि लेने कुओं में गिर रहे है। या फिर प्यासे मर रहे है। जहां इक्का-दुक्का जल श्रोत अटल सागर के नाम है। वह अब शिकारियों के चारगाह और जानवरों को मौत के अड्डें बन गये है। 

पूछा जाये तो न तो जिला प्रशासन, वन, जलसंसाधन, लेाकस्वास्थ यांत्रिकी या पार्क प्रबन्धन के पास ऐसी कोई कारगार योजना ही नहीं जिसे प्यासे मरते वह बेजुबान भले ही न समझे, मगर समझ वाले भी चेतन्य शून्य दिखाई पढ़ते है। जिसके चलते अब हजारोंं लाखों पशु-पक्षी, जीव-जन्तु, जानवरों के आगे पेयजल का बड़ा धर्म संकट आन पड़ा है। 
मगर कत्र्तव्य विमुख लोग आज भी चैन से बैठ शायद उस महामारी के इन्तजार में है जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। 

हालाकि पशु-पक्षियों की प्यास मृत्यु की खबरें भी अब धीरे-धीरे आने लगी है। चाहे ग्वालियर, भिण्ड, दतिया, मुरैना हो या फिर श्योपुर, शिवपुरी, गुना सभी दूर ऐसे ही हालात जान पड़ते है। मगर सर्वाधिक हालात तो उस शिवपुरी जिले में खराब है, जो भूगोलिक दृष्टि से बड़ा और वन क्षेत्र जीव-जन्तुओं और नेशनल पार्क से घिरा है। जहां के निस्तारी सिंचाई तालाबों पर खुलकर दबंगई चल रही है। और हजारों बोरो से इस जिले की धरती छल्ली कर दी गई। फिर भी परिणाम शून्य है। अगर अटल सागर को छोड़ दे, तो बैराड़, पोहरी, कोलारस, खनियाधाना, पिछोर, शिवपुरी, करैरा ऐसे क्षेत्र है जहां भू-जल स्तर  तेजी से नीचे जा रहा है। जैसा कि लोग कहते है कि उन्हें जल संसाधन से बड़ी उ मीद थी जिसके मुखिया जुलानियाँ है। मगर जल संसाधन के तालाबोंं में लहलाती प्याज,सरसों, गेंहू, मटर, तरबूज की फसलों ने इन बेजुबानों पर इस भीषड़ पेयजल संकट पर गहरा कुठाराघात किया है, जो मड़ीखेड़ा, उड़वाया, दिनारा, रामचन्द खेड़ी, मझेरा, इमलिया, मूजबार, पाडरखेड़ा, सेवढ़ा, पिपरौदा, कांकर, बांसखेड़ी के अलावा अन्य तालाबों पर देखा जा सकता है जो आज दंबगों के दोहन के अड्डे बने है। देखना होगा जिस छवि के लिये म.प्र. शासन के अपर मु य सचिव जलसंसाधन जाने जाते है। आखिर इस विभीसिका से निवटने अब क्या कदम उठाते है। 
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