लकीर की फकीर नीति, ले डूबी, नई आबकारी नीति


व्ही.एस.भुल्ले/विलेज टाइम्स, म.प्र. ग्वालियर- वर्ष 2016 के लिये 3 मार्च  2016 को बुलाये गये टेन्डरों में जिस तरह से शराब ठेकेदारों ने अरुचि दिखाई है उससे साफ है कि वर्ष 2015 में लेने वाले शराब ठेकेदारों को खासा घाटा हुआ है। और यहीं कारण है कि गत वर्ष लुटे पिटे ठेकेदारों इस वर्ष 2016 के लिये होने वाले ठेकेदारो में कोई रुचि नहीं दिखा रहे है। वर्तमान ठेकेदारों के घाटे के हालात यह है कि अन्तिम समय में पूरी डियूटी चुकाने के बावजूद भी मिलने वाला माल नहीं उठा रहे है। 


बहरहाल अगर नई शराब नीति की असफलता के कारणों को देखे तो गत वर्ष 2015-16 में प्राप्त होने वाले राजस्व जो कि 2014-15 की तुलना में आरक्षित मूल्य से कहीं अधिक था। फिर भी नई आबकारी नीति 2016-17 में प्राप्त राजस्व पर 15 फीसदी राजस्व और बढ़ा कर आरक्षित मूल्य तय कर 3 मार्च 2016 को बुला लिये गये। जो घाटे में चल रहे ठेकेदारों को सीधे-सीधे घर द्वार बिचने का सामान लगा परिणाम कि अधिकांश जगह ठेकेदारों ने फार्म ही नहीं खरीदे। 

अगर आबकारी विभाग चाहता तो 2015-16 के आरक्षित मूल्य पर 15 फीसदी राजस्व बढ़ा खुली स्पर्धा हेतु निविदा बुलाता तो आज सारी दुकाने उठ चुकी होती। 

वहीं दूसरी ओर एक कारण यह भी रहा कि जो वर्ष 2015-16 की नीति में मिनी मम व मैग्जीमम बिक्री दरो पर बेचने की कानूनी बाध्यता है। उसमें 2016-17 के लिये मैक्सीमम दर की बाध्यता को हटा लेना था जिससे प्रतिस्पदात्मक ढंग से ली गई दुकानों में घाटा पूर्ति की स भावना बनी रहती और ठेकेदारों को प्रतिस्पर्धा के लिये बाध्य करती। अगर अब भी प्रदेश के राजस्व हित में सरकार या आबकारी महकमा ऐसा कर सका तो कोई कारण नहीं जो प्रदेश के ठेके न हो और हो सकता है कि स्वयं प्रतिस्पर्धा के माध्यम से आबकारी को वर्ष 2015-16 की तुलना में अधिक राजस्व प्राप्त हो सके। देखना होगा कि सरकार डूबते राजस्व को कैसे बचा पाती है। 
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