आबकारी: गलत नीति, औचित्यहीन हुई जिला समिति

नई आबकारी 2016-17 को बनाने वाला आबकारी अमला भले ही अपनी पीठ थपथपाते 3 मर्तवा आये आधे अधूरे टेन्डर को लेकर मंत्र मुग्ध हो, मगर गलत नीति के चलते औचित्यहीन होती जिला समिति और खुली प्रतिस्पर्धा के आभाव में सेकड़ों करोड़ का राजस्व अब अटकता दिखाई पड़ता है। 


हालाकि 28 मार्च को एक मर्तवा फिर से देशी-विदेशी मदिरा समूहों के लिये टेन्डर बुलाये गये है वही निर्धारित मूल्य से कम कीमत के टेन्डर भोपाल भेजे गये है। अगर आबकारी अमले की नीति यहीं रही तो 28 मार्च को आमंत्रित टेन्डरों में भी निर्धारित मूल्य से अधिक मूल्य आबकारी महकमें को मिल सके। इसमें किसी को संदेह होना लाजमी है। 

जिस प्रकार से वर्ष 2015-16 में कई गुना अधिक दामों पर देशी-विदेशी मदिरा दुकाने स्वीकृत की गई और बीच में शराब ठेकेदारों द्वारा छोड़ दी गई, जिसके लिये विभाग द्वारा वर्ष भर पुन: टेन्डर बुला कम कीमतों पर दुकाने स्वीकृत की जाती रही कुछ तो आज तक नहीं उठ सकी और शासकीय स्तर पर चलाई जा रही है। उससे सबक लेते हुये भी कोई कारगार कदम का नहीं उठाया जाना संकाष्पद लगता है जबकि विभाग चाहता तो अधिक राजस्व हासिल करने के लिये वर्ष 2015-16 की तरह खुली प्रतिस्पर्धा वर्ष 2016-17 में भी करा सकता था। 
इसके लिये वह चाहता तो वर्ष 2015-16 के लिये निर्धारित मूल्य पर ही 15 या 20 फीसदी राजस्व बड़ा टेन्डर बुला सकता था। मगर विभाग ने ऐसा न कर जिस कीमत पर जो समूह वर्ष 2015-16 के लिये स्वीकृत हुये उसी पर 15 फीसद राजस्व बड़ा टेन्डर बुलाये गये। 
इतना ही नहीं जो बैसिक लायसन्स फीस कभी नगद जमा कराई जाती थी टेन्डर के साथ उसे बैंक गारन्टी में तब्दील कर दिया गया जो खुली प्रतिस्पर्धा में बाधक बनी, क्योंकि पुराने ठेकेदारों को छोड़ दें तो नये ठेकेदारों को बैंक गारन्टी बनबाना उतना आसान नहीं। 
यहीं दो प्रमुख कारण हो सकते है जिसके चलते आज सेकड़ों करोड़ का राजस्व अब डूबने के कागार दिखाई जान पड़ता है। अगर 28 मार्च को भी निर्धारित मूल्य पर टेन्डर नहीं डल सके, तो निश्चित शासन को वर्ष 2016-17 में सेकड़ों करोड़ का राजस्व गबाना पढ़े तो कोई अतिसंयोक्ति न होगी। 
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