विमुख व्यवस्था में, जान के लाले..................?

व्ही.एस.भुल्ले @तीरंदाज
भैया- ऐसी बैहयाई देख व्यवस्था में मने तो कलेजा मुंह को आवे, मगर हारे कत्र्तव्य विमुख, होते माननीय श्रीमानों को इतनी सी बात क्यों समझ न आवे कि अब तो बेजुबान ही नहीं जुबान वाले भी चारा- पानी को कलफ पलायन कर रहे है। मगर व्यवस्था के तेवर दिन व दिन और भी बद से बत्तर हो रहे है। अल्प वर्षा, सूखा, ओला बैमोसम पानी उस पर कत्र्तव्य विमुख व्यवस्था सभी का कहर एक साथ टूट रहा है। ऐसे में हारे जैसे गांव, गरीब, किसान का तो मानों कचूमर निकल रहा है, आखिर कै करुं भाया। 


भैये- अब प्रकृति की क्रूरता पर तो जोर चलने से रहा, रही बात कत्र्तव्य विमुख व्यवस्था कि सो भैये थोक बन्द बढ़े वेतन भत्तों का फिलहाल हारी मशीनरी में लुप्त चल रहा है, रही सही कमी के लियेे आये दिन धरना-आन्दोलन हो रहा है। इसमें कत्र्तव्य विमुखता कैसी नये-नये प्रोफारमाओं पर आकड़ों  का खेल सही चल रहा, सदन ही नहीं मंत्रालय तक त्रिस्तरीय जानकारियों का बन्च समय से पहुंच रहा है। टी.एल. पर ा, ऑन लाइन, हेल्प लाइन जनशिकायत का भी कार्य देखों तो पूरी मुस्तैदी से चल रहा है। मगर आवंटन के आभाव और प्राकृतिक के आपदा बस कोहराम मचा है। कै थारे को मालूम कोणी जब शासकीय सेवा में आया था तब मने जवान था कमर 32, तो सीना 36 लिये गबरु जवान था। वेतन भले ही अब भारी भरकम हो, मगर समय अब बेलगाम है। पता ही नहीं पढ़ता कि कब सेवा शुरु और कब खत्म, मने तो चौबिसों घन्टे जनसेवा और कत्र्तव्य निर्वहन में जुटा हूं, फिर कत्र्तव्य विमुखता कैसी मने तो सेवा के लिये जीवन भर सुख सुविधाओं के नाम लुटा-पिटा हूं।  
भैया- मने थारे जैसे कत्र्तव्य निष्ठ दिमाक रगड़ुओं को थोड़े ही कुछ कह रहा हूं मने तो बेजुबानों का चारा, चरनोई की भूमि और भीषण गर्मी में जान बचाने उन कांजी हाउस पोखर, तालाब, बोर बैल, हेन्ड प पों का पता पूंछ रहा हूं। जिससे मुये बेजुबानों जानवर, पशु-पक्षी अपनी जान और नस्ल तो बचा लेगें और पालतू आवारा जानवर कांजी हाउसों में भीषण गर्मी के दिन बिता लेगें। 
हम जुबान वाले भी किसी न किसी नक्कार खाने में चिल्ला ही लेगें नही तो अपनी ही दम पर पैसो से ही पेयजल हासिल कर जान बचा लेगें। मगर उन बेजुबानों का क्या? उन्हें तो यह पता ही नहीं कि भूखे प्यासे, प्यास बुझाने जिस कुये में वह गिर रहे है। वहां उनकी जान भी जा सकती है। जिन गिनी चुनी जगहों पर जंगली जानवर पशु-पक्षी प्यास बुझा रहे है। वहां बेरहम शिकारी भी पैठ बना घात लगाये बैठे हो सकते है। 
भैये- तने तो बावला शै कै थारे को मालूम कोणी हारी व्यवस्था मुकबधिर ही नहीं भूखे प्यासों बेजुबानों के लिये न जाने कितनी येाजना चला लाखों करोड़ों लुटा रही है। व व्यवस्था चलाने वालो को लाखें करोड़ों रुपये वेतन भत्तों के रुप में चुका रही है। रही बात प्राकृतिक आपदा की यो हजारों करोड़ रुपये भी पीडि़त को दिला रही है। इतना क्या कम है जो तने चीथ पुकार मचा रहा है। कै थारे को हारे माननीयों का कष्ट और श्रीमानों का व्यस्थ शेडयूल समझ नहीं आ रहा है। पहले जवानी की जंग तो जीत ले, फिर बेजुबानों को भी समझ लिया जायेगा और उदघाटन, समापन, आदेश, निर्देश, भोजन, बैठक, विश्राम वालो को भी आज नहीं तो कल इन बेजुबानों की बददुआ असर समझ आ जायेगा।  
भैया- मने समझ लिया थारा इशारा हारे माननीय, श्रीमान सभी चिन्तित हो सेवा में जुटे है और हर समय सॉशल मीडिया पर अपडेट बने हुये है हाईटेक व्यवस्था में सबसे ज्यादा हम गांव, गरीब का ही तो रोना है, जमाने की सच्चाई जो भी हो, आकड़ों और बैठकों का आंकड़ा तो पूरा है। फिर शिकायत कैसी जैसे भी हो यह गर्मी, प्यास या भूख से निवटते इन बेजुबानों की कट जायेगी, मगर इन बेजुबानों की बददुआं आज नहीं तो कल अवश्य नजर आयेगी। 

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