पवित्र भूमि पर पूंजीवाद का नंगा नाच

व्ही.एस.भुल्ले/विलेज टाइम्स, मार्च 2016- इस महान देश में पैर पसार चुके पूंजीवाद, स्वार्थ, अहंकार को लोग जब भी इस समझ, समझा पाये कि इस देश का नागरिक पेट से मजबूर हो सकता है। मगर मान-स मान, स्वाभिमान से कंगाल नहीं, इतिहास गवाह है अगर इस महान भूमि के महान नागरिकों की संस्कृति, संस्कार पर पराओं, मूल्य, सिद्धान्तों की आढ़ में भावनात्मक विश्वासघात के सहारे खुद को स्वयं के स्वार्थ, अहंकार के लिये धन, बाहुबल, सं याबल से नये-नये संस्कार, संस्कृति पर परा, मूल्य सिद्धान्तों में कोई बाधना चाहता है तो यह ऐसे लेागों कि बौद्धिक दिवालियेपन की पराकाष्ठा है। 

क्योंकि जिस देश का नागरिक पर्याप्त भोजन के आभाव में अपने संस्कारों के सहारे मान-स मान, स्वाभिमान की खातिर पीढिय़ां गुजार सकता है। कई दिनों  ही नहीं महिनों भूखे रहे, दुश्मनों से किसी भी परिस्थिति में लोहा ले, उसे परास्त कर सकता हो। ऐसे महान देश में पूंजी, धन, सं या, बाहुबल, भावनाओं के सहारे कुछ बिकाऊ मीडिया की बदौलत यह खेल कुछ दिन तक तो चल सकता है, और वह दिन ही नहीं, कुछ वर्षो भी चलता सकता है, मगर ज्यादा दिन नहीं। 

ऐसे लेाग समझ ले, कि हमारे देश में शासन करने वाले कई सूरवीर, बादशाह, राजा, आक्रान्ताओं का इतिहास है उनके द्वारा बनाये गये बड़े-बड़े महल, भवन, किले, गढ़ी जागिरे है। मगर अधिकांश सूरवीर शासक आक्रान्ताओं के वंशज, न ही वह महल, वृहत किले, गढ़ी, भवनों के मालिकों तक का कोई अता-पता है। जिनके कभी जयकारे लगा करते थे अगर ऐसे में इस महान भूमि पर कोई स्वार्थी या कोई अंहकारी इस देश के पेट से मजबूर लेागों की मजबूरी उनकी भावनात्मक बैवसी पर  नया इतिहास पढ़ाने का प्रयास कर रहा है तो उसकी यह बड़ी भूल है। फिर चाहे वह व्यक्ति, विचार धारा हो जिनका लक्ष्य जो भी हो, वह प्रकृति विरुद्ध अपने मंसूबे कभी पूर्ण नहीं कर पायेगें। क्योंकि यह भारत महान है। अब इस महान भू-भाग पर बौद्धिक दिवालियेपन का इससे भद्दा माजक क्या होगा जिस लेाकतंत्र केे  सहारे जनता को भगवान मान उसकी सेवा के नाम जो लोग सत्ता तक पहुंचते है। वहीं स्वयं को भगवान मानने के लिये जनता की सेवा छोड़ उसे नया सबक सिखाना शुरु कर देते है। और अपने चापलूस स्वार्थी अनुयायियों के सहारे स्वयं को भगवान कहलाने का प्रयास करते है। तो कई स्वार्थी अपने मानवीय कत्र्तव्यों को छोड़ अपने स्वार्थी की खातिर किसी को भी महान देश भक्त, तो किसी को राष्ट्रद्रोही करार दे देतेे है। 

क्या यह स्वार्थ, अहंकार की पराकाष्ठा नहीं। बेहतर हो कि ऐसे लेाग अपनी जबावदेही, कत्र्तव्यों को पहचाने जिसके लिये जनता ने उन्हें अपना अमूल्य मत देकर चुना है या फिर प्रायोजित भावनाओं, मजबूरियों के चलते लेाकतंत्र के मन्दिर संसद, विधानसभाओं में भेजा है इतना ही नहीं अपने खून पसीने के धन से लेाकतंत्र की समस्त संस्थाओं को सीचा है। उन्हीं पथराई आंखों से खेत, खलियान, गांव-गली, मोहल्ले में बैठ, आपको वह इस उ मीद से देख रहे है कि आप उनका न सही, उनकी आने वाली पीढ़ी का जीवन सुरक्षित, खुशहाल और इस महान राष्ट्र को और महान बनाने कुछ तो करोगे। 

जब देश की जनता ने कोई सरकार को चुना है तो उसे पांच वर्ष तक काम तो करने देना चाहिए, सही गलत जो भी हो लेाकतंत्र की व्यवस्था अनुसार सहमति-असहमति व्यक्त करो और जनता के बीच जाकर 5 वर्ष तक मेहनत करो जिससे हो सकता है अगली मर्तवा आपको सरकार में आने का मौका मिल इस महान देश और इस महान देश की जनता की सेवा करने का अवसर मिल सके। 
वहीं सरकार को भी चाहिए कि वह बगैर आरोप-प्रत्यारोप की परवाह किये बगैर अपने राजधर्म का पालन पूर्ण निष्ठा और ईमानदारी के साथ करे, वह भी किसी बगैर पक्षपात के। 

मगर दुर्भाग्य कि ऐसा नहीं हो पा रहा है, सरकार, सरकारे या विपक्ष आय दिन बेमतलब  के मुद्दों पर ल_म, ल_ हो रहे है। हमें समझना चाहिए कि देश के कानून से बढ़कर कुछ भी नहीं सरकार का कत्र्तव्य है कि वह संसाधन बढ़ाये जितने भी संसाधन लगे, लगाना चाहिए और हर हालत में कानून का पालन होना चाहिए। 

देश व देश की जनता के फैसले अगर सदन के बाहर गाहे, बगाहे यूं ही सड़कों या फिर टी.व्ही. चैनलों पर होते रहे तो लेागों में भय और अराजकता का माहौल ऐसे ही पनपता रहेगा, और आम नागरिक ऐसे ही कलफता रहेगा। बेहतर हो कि देश भक्त पंूंजीवाद, धन, सं या, बाहुबल, स्वार्थ, अहंकार की मंशा भांप उन अंहकारी स्वार्थियों को सत्ता सौपानो से बाहर का रास्ता दिखाये, बरना इस देश की जनता जागी तो वह अपने मान-स मान, स्वाभिमान और इस पवित्र भू-भाग की रक्षा करने में सक्षम है, जिसका इतिहास गवाह है। 
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