क्या देश में एक भी, बालगंगाधर, गांधी, बोस नहीं

व्ही.एस.भुल्ले। भारत की ये वो महान हस्तियां है जो असल में इस आजाद भारत के असली हीरो है। जिनकी कुर्बानियों पर हम आज खुले में सांस ले, अभिव्यक्ति की आजादी के नाम, किसी को भी भला बुरा कहने में, अकेले ही नहीं, बल्कि अब तो संगठित रुप से लगे है। फिर चाहे वह मंच सोशल मीडिया का हो, या फिर जाप्ते की  मीडिया, राजनैतिक दल, संगठन, समाज, व्यक्ति या फिर नेता खुलकर इन मंचों का उपयोग इतिहास झूठलाने औरअपने निहित स्वार्थो के सहारे छवि चमकाने के लिये हो रहा है। जबकि सत्य के रास्ते राष्ट्र सेवा में लगे वो शक्स और अन्तिम पंक्ति में खड़े हर उस व्यक्ति का जमीर जी भर कर रो रहा है जिन्होंने आजादी के लिये जान देने वालो का इतिहास पढ़ा या सुना है।  असल हीरो तो इस देश के वह थे जो बगैर कुछ कहे अपेक्षा किये इस देश के लिये अपनी कुर्बानी देकर चले गये। देखा जाये तो उन महान हस्तियों का भी सुनहरा भविष्य था, परिवार थे, उनका अपना बचपन और जबानी भी थी जो उन्हें स्वयं के जीवन के लिये बहुमूल्य हो सकती थी मगर हमारा भविष्य सुधारने और हमें गुलामी की जंजीरों, अत्याचार व्यवचार, लूटपाट, मारकाट इत्यादि से निजात दिलाने अपना बचपन जबानी, दोस्त यार, परिवार सब कुछ हमारे लिये उन्होंने बगैर किसी अपेक्षा, स्वार्थ, सु ा-सुविधाओं को दरकिनार कर नौछावर कर दिया। 

आज बड़ा अफसोस होता है जब हम नये-नये हीरों के नाम और उनकी लाइफ स्टाइल के बखान सुनते है। आत्मा कचोटती है जब हम वायरल होते विभित्र वीडियों फिल्मों में हमारे चुने हुये माननीय और पढ़े लिखे नौकरशाहों को देखते है। हम धैर्य खोने पर मजबूर होते है। जब कोई दल सत्ता हासिल करने किसी बलात्कार, हत्या, लूटपाट के आरोपी को टिकिट दे स-स मान अपना प्रत्याशी बनाते है और वहीं बलात्कारी घोटालेबाज जघन्य अपराधी चुनावों में जीत उन सर्वोच्च सदनों में पहुंच अपने आचार व्यवहार का फूहड़ प्रदर्शन कर लोकतंत्र के मन्दिर की पवित्रता पर सवाल खड़े करवाते है। जिनकी जगह किसी भी राष्ट्र में सलाकों के पीछे होना चाहिए। 

काश इस दृश्य की कल्पना हमारे हजारों सेकड़ों उन देश भक्त नेताओं ने आजादी की लड़ाई लड़ते वक्त की होती तो निश्चित ही वह अंग्रेजो से देश तो बाद में आजाद करा लेते, पहले तो ऐसे दल, संगठन, शिक्षित, नेताओं को ठीक कर जाते या फिर हमें गुलाम का गुलाम ही छोड़ जाते जिससे आज भी हम अंग्रेजो के गुलाम बन वह अत्याचार व्यवचार सहते रहते जितने जघन्य अत्याचार लेागों को आज सहन करना पड़ रहे है। इतना ही नहीं इस गुलामी में और न जाने कितने 1857 के क्रान्ति के नरसंहार, जलिया वाला काण्ड में मारे गये हजारों निर्दोष देश भक्त के रुप में महान शहीदों पुरुष, स्त्री, बच्चो के लाशों के ढेर देख पाते, जो हमने आजादी के बाद 1947 के बटबारे की मारकाट आय दिन होते दंगे लूटपाट, तोडफ़ोड़, बलात्कार, सामूहिक बलात्कार, हत्याओं के  रुप में देख सुनने मिलते है, कम से कम उनके रहते तो हम यह कू्ररता बर्बता तो नहीं, देख सुन पाते। 

और उस गुलाम भारत में, यह कभी नही सुन पाते कि किस दल में कितने हत्यारे, बलात्कारी, डकैत, लुटेरे है। कितने सड़क पर और कितने विधानमण्डल संसद में जा पहुंचे है। किस नेता ने समाज सेवा, राष्ट्र सेवा में कितनी अकूत दौलत कमा ली, कितने नौकरशाहों ने अपने जमीर की कितने करोड़ की राशि बसूल डाली। किन-किन सरकारों ने जनता के गाढ़े पसीने की कमाई को किस हद तक योजना विकास के नाम अपने समुचे कुनवे को जनता के धन से सीचा है। सवाल कई है, सत्य भी सामने है मगर सत्य बोलने मुंह खोलने सबा अरब की आबादी में एक भी तैयार नहीं। किसी को खुद का इतिहास व भविष्य दिख रहा है तो कोई सारे सुख समाज सेवा, देश सेवा के नाम भोग अपनी सात पीढिय़ों तक का भविष्य सुरक्षित कर रहा है। तो कोई ऐसे लेागों के पद चिन्हों पर चलने लाइन में खड़ा है, जो यह सब भोग रहे है। 

क्योंकि आज हम न तो आजाद रहे न ही गुलाम, मगर अफसोस के हमारे बीच न तो अब वो बालगंगाधर तिलक रहे, जो गांधी जी को साउथ अफ्रीका से लेकर आये। और अपने धन से महात्मा गांधी को पूरे भारत वर्ष का भ्रमण कर यह समझा पाये कि हमारा देश, हमारे लोग गुलामी की किस पीढ़ा में, नारकीय जीवन जी रहे है और अंग्रेज किस तरह हमारे देश को लूट हमारे लेागों पर जुल्म सितम ढा रहे है।  

न ही वह सुभाषचन्द्र बोस रहे जिन्होंने पहली मर्तवा तिरंगा फहरा आजाद हिन्द फौज की स्थापना कर दुराचारी, अत्याचारी अंग्रेजो पर हमला कर उनके छक्के छुड़ा उन्हें भारत छोडऩे पर मजबूर कर दिया। जबकि वह भी टॉप क्लास में आई.सी.एस. पास मैधावी जबान थे जिसे हम आज आई.ए.एस. के रुप में जानते थे। न हीं वह महात्मा गांधी रहे जो एक बैरिस्टर ही नहीं साउथ अफ्रीका के रंगभेद के खिलाफ वह चर्चित चेहरे रहे जिनके नेतृत्व की चर्चा केवल साउथ अफ्रीका ही नहीं समुचे विश्व में थी। 

उस महान हस्ती ने अपनी मात्र भूमि अपने प्रिय देश भारत और इन्सानियत के लिये अपना टाई सूट उतार, लंगोटी लगा ली और देश के पीढि़त गरीब, निरीह जनता को अत्याचारों से मुक्ती दिलाने देश की आजादी के संघर्ष में कूद पढ़े, जिसको अन्तिम पुरुस्कार के रुप में आजाद भारत में सीने को छल्ली करती गोलियां मिली और हेराम के सत्य, पवित्र शब्दो को देश और देश वासियो को देकर बगैर किसी सिकवा शिकायत, अफसोस के अन्तिम बिदाई ली। 

दिल कचोटने लगता मन विचलित होने लगता है जब चन्द स्वार्थी हलकट ऐसे महान पुरुषों के बारे में घटिया विचार रखते है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम टीका टिप्पणी करते है। क्योंकि इन महापुरुषों ने अपना सारा सार्वजनिक जीवन सत्य तथा देश व देश वासियो के लिये जिया और बगैर किसी अपेक्षा व स्वार्थो से इतर देश व देश वासियों के लिये  न्यौछाबर कर दिया। ऐसे महापुरुषों की तुलना करते वक्त अपने-अपने स्वार्थो की खातिर नये नये नामों से उनके समकक्ष अन्य नामों रख आलोचना करना किसी भी महान राष्ट्र या स य समाज के संस्कार न ही संस्कृति हो सकती है। क्योंकि भारत एक  आदर्श संस्कृति, मूल्य, सिद्धान्तों की धरोहर है जिसमें सत्य उसका सरोकार रहा है। इससे इतर भारत न तो आज तक किसी ऐसी संस्कृति मूल्य सिद्धान्तों को आत्मसात कर सका है, न ही कर सकेगा जो इन्सानियत के  विरुद्ध हो।  

इसीलिये मेाबाइल, टी.व्ही. इन्टरनेट, गांव, गली के वो 65 फीसद कामगार हाथ दिमाकों को स्वयं से बाहर निकल प्रकृति, देश, समाज और उन महापुरुषों के बारे में सोचना चाहिए जिनकी कुर्बानियों कीमत पर हम स्वच्छन्द सांस ले पा रहे है।  बरना भ्रम की दुनिया लाल बगीचा बिछाये नरकीय जीवन तैयार करने हाथ फैलाये सामने खड़ी है, फैसला हम सभी को लेना है कि सत्य क्या है?  

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