बगैर प्रमाण परिणाम के आरोप-प्रत्यारोप अनुचित

व्ही.एस.भुल्ले | अभिव्यक्ति के नाम जिस तरह का नंगा नाच विगत कुछ वर्षो से चल रहा है उससे सत्ता तक पहुंच का मार्ग भले ही सुगम हुआ हों, मगर आज उसने हमारे राष्ट्रीय, सामाजिक, प्राकृतिक मूल्य सिद्धान्त, पर परा, संस्कृति को कुरुप बना, ऐसे दल-दल में धकेल दिया है, जहां अब राष्ट्रीयता का दम घुटने लगा है। वहीं भाई लोग आज भी अभिव्यक्ति की आजादी के नाम राष्ट्र को दरकिनार कर अपनी-अपनी रोटियां सेकने में मशगूल है। क्या देश में एक भी ऐसा राष्ट्र भक्त नहीं बचा जो निस्कलंक चरित्रवान क्या समाज का कोई ऐसा बन्धन नहीं रहा, जिसके ककहरे को पढ़ लोग महान बनते थे। सच तो यह है कि न तो परिवार, समाज, राष्ट्र में एक भी ऐसा नाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के चलते निस्कलंक बचा जिस पर कोई टीका टिप्पणी न हो और लोग उसे स मान की दृष्टि से ले, उस पर नाज कर पाये।  


देखा जाये तो पर परा संस्कृति, संस्कार के महाविनाश के पीछे कोई खड़ा है तो वह पूंजीवाद, कत्र्तव्य विमुख नौकरशाह, सत्ता लालची नेता और बिकाऊ मीडिया व धन लालची, फिल्म, धारावाहिक प्रोडयूसरों की ल बी फौज और वह कलाकार जो चन्द रुपये की खातिर पीढ़ी की पीढ़ी ही नहीं समुचे समाज को विकृत बनाने का अभियान चलाये हुये है। जिसके परिणाम, कई परिवारों में ही नहीं, आज समाज में भी देखने मिल रहे है। जिसका का कुरुप चेहरा देख प्रकृति ही नहीं इन्सानियत भी कांप जाये। 

मगर यह सब कुछ तब हो रहा है जब 65 फीसदी देश की तरुणाई अपनी-अपनी प्रकृति अनुकूल अपने बेहतर भविष्य को समेटे खुशहाल जीवन का सपना सजोय इस इन्तजार में बैठी है कि वह अब शुरुआत करेगें। मगर व्यवहारिकता से इतर दिशाहीन विकल्प फिलहाल शून्य है। 

ऐसा नहीं कि देश में इससे पूर्व कोई कार्य राष्ट्र हित समाज हित में नहीं हुआ हो, देखा जाये तो काफी कार्य हुआ है उसका परिणाम है। हम अच्छे बुरे की खुलकर समीक्षा कर पा रहे है मगर र्दु ााग्य कि सत्ता धारी और विपक्ष के लोग अच्छे बुरे की समीक्षा नहीं कर पा रहे है। न ही ऐसे कोई परिणाम एक कत्र्तव्यनिष्ठ, जबावदेह पक्ष-विपक्ष के रुप में देश के सामने ला पा रहे है। ऐसे में आरोप-प्रत्यारोप अहम अहंकार की जंग में देश वासियों के सपने स्वाहा होते जा रहे है। 

मगर देश आज भी यह नहीं समझ पा रहा कि सरकार का कार्य जनकल्याणकारी, विकास उन्मुख नीति कानून बनाना व समाज का उत्थान और बेहतर समझ राष्ट्र के लिये बने, ऐसी नीति कानून लाना है।  जिन पर संसद ही नहीं विधानसभाओं सार्वजनिक मंचो पर चर्चा हो सके और समीक्षा उपरान्त उन्हें कानून तथा नीति का जामा फहनाया जा सके। और फिर विपक्ष द्वारा भी उस पर सहमति या असहमति व्यक्त की जा सके।  
ये सही है सरकार के पास उतना बहुमत राज्यसभा में नहीं जितना होना चाहिए। 
तो ऐसे नियम, कानून, नीति जनता के बीच ले जाना चाहिए जिससे लेाक कल्याणकारी, राष्ट्र हित की नीतियों पर जनता विपक्ष पर अपना दबाव बना सके। 

ऐसा नहीं कि सरकार विगत वर्षो में देश व देश की जनता के लिये कुछ नहीं कर सकी, कुछ प्रमाणिक कार्य अवश्य हुये है जिनकी चर्चा की जा सकती है। चाहे वह अन्तराष्ट्रीय स्तर पर देश की ब्रान्डिंग, पड़ोसी देशों से बेहतर संवाद और दुश्मनों पर लगाम भारत की अन्तराष्ट्रीय प्रष्ठभूमि में बड़ा बदलाव देखा गया है। जो रोजगार और सुरक्षा की दृष्टि से राष्ट्र हित में है। 

अगर हम जन कल्याण, राष्ट्र कल्याण के क्षेत्र में ले तो जनधन, प्रधानमंत्री रोजगार सुरक्षा, बीमा, स्केल, ग्रीन, सिंचाई, कृषि, स्वच्छता जैसे कार्यक्रम राष्ट्र और समाज के लिये दूर की कोणी साबित हो सकते है। 

यह अलहदा बात है कि प्राकृतिक जलस बन्र्धन, सिस्टम, आन्तरिक सुरक्षा, सूचना और प्रमाणिक सुविधायें संचार परिवहन के क्षेत्र में जितना काम होना था नहीं हो सका तथा नौकरशाहों की अरुचि के चलते स्थानीय स्तर पर मौजूद योजनाओं का लाभ भी लेागों को नहीं मिल पा रहा है। 

इस पर विपक्ष सहमति, असहमति विरोध दर्ज करा लेाकतंत्र में अच्छी पर परा का सूत्रपात कर सकता है मगर दुर्भाग्य कि ऐसा नहीं हो रहा है। यहीं आज देश में चिन्ता का विषय है। 

बेहतर हो देश के बुद्धिजीवी देश भक्त, राष्ट्र भक्त, सत्ताधारी, विपक्षी दल, सरकार राष्ट्र व समाज की चिन्ता करे, न कि अहम अंहकार के लिये एक दूसरे को व्यक्तिगत रुप से आरोप-प्रत्यारोप करे। क्योंकि आम अन्तिम पंति में खड़े हर उस नागरिक कि आप उ मीद है जिन्होंने आपको देश की खुशहाली और सुरक्षा के लिसे चुना है। फैसला आपको करना है कि आप कैसा राष्ट्र और समाज चाहते है तथा राष्ट्र और समाज को क्या देना चाहते है। 
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