दिशा हीन अभिव्यक्ति, समझदारों की चुप्पी और भयभीत समाज

व्ही.एस.भुल्ले | सतत सत्ता में बने रहने, दिशा हीन अभिव्यक्ति की आजादी का खुलेयाम शर्मनाक प्रदर्शन और दिशा देने वालो की ऐसे मौको पर कभी न टूटने वाली चुप्पी, किसी भी भयभीत समाज के निर्माण में सहायक हो सकती है शायद ही कही सतत सत्ता में बने रहने इतनी बड़ी कीमत किसी भी व्यवस्था को चुकानी पढ़ती हो, जिसे आज हम चुका रहे है। 


व्यवस्था, विचारधारा से इतर समाज में स्थापित होते नये-नये लक्ष्य इस बात के स्पष्ट प्रमाण है कि हमारा सामाजिक ककहरा दरक चुका है और स्थापित व्यवस्था, सत्ता उन्मुख हो दिन व दिन निस्प्रभावी होती जा रही है। क्योंकि दिशा हीन अभिव्यक्ति पर मूकदर्शक बन तमाशा देखने वाले सत्ता भोगी इन्सान और समाज को आयना दिखाने वाली मीडिया महान ने हमारी संस्कृति, संस्कार मूल्यों सिद्धान्तों का कचूमर बना, न तो वह चरित्र ही छोड़े है, न ही वह मूल्य, सिद्धान्त जिनकी उंगली पकड़ किसी भी स य समाज और चरित्रों का निर्माण हो, सर्वस्वीकार्य हो व्यवस्था के मार्गदर्शक बन पाते, जिससे आम नागरिक स्थापित व्यवस्था में स्वछन्द विचरण कर खुशहाल जीवन का निर्माण कर पाता। यूं तो किसी भी स्थापित व्यवस्था के अपने मूल्य सिद्धान्त होते है। जहां भी लेाकतांत्रिक व्यवस्था होती है उसे चलाने वाले ाी गाहे-बगाहे उसकी संस्थायें होती है। जिन्हें लेाकतंत्र के स्त भ के रुप में जाना जाता है। जो लेाकतंत्र को मजबूत बना, स्थापित मूल सिद्धान्तों की रक्षा करते हुये समाज को संरक्षण और व्यवस्था को पारदर्शी व जबावदेह बनाते है साथ ही हर नागरिक, व्यवस्था को समय-समय पर ऐसा कत्र्तव्य बोध करा, लेागों के खुशहाल जीवन का मार्गप्रस्त करते है। 

मगर जब किसी भी कारण बस लोकतंत्र के ये स्त भ अपने कत्र्तव्यों से विमुख होने लगे तो समझों सामाजिक ककहरा दरक चुका है। और ऐसे में बगैर समाज को सुधारे, व्यवस्थागत सुधार के सारे प्रयास नगण्य साबित होगें। ऐसी स्थिति मे आम नागरिकों के बीच भय का माहौल होना स्वभाविक है। क्योंकि जो सत्ता में होते है वह किसी भी स्थिति में सत्ता छोडऩा नहीं चाहते, जो सत्ता से दूर होते है, वह सत्ता तक पहुंचने कुछ भी कर गुजरना चाहते है फिर कीमत जो भी हो। 

वहीं एक वर्ग वह भी है जो चुप रहने और सत्तासीनों का हुक्का पानी तैयार करने में ही अपनी भलाई समझ कत्र्तव्य निर्वहन में स्वार्थ बस जुटा रहता है। फिर सरकार जिसकी भी हो, जबकि ऐसे लेागों को कानूनी रुप से व्यवस्थागत संरक्षण होने के बावजूद भी वह सिर्फ अपनी पगार और अंहकार तक ही सीमित रहता है। 

रहा सवाल आयना दिखाने वालो का सो जिस पूंजीपती का जैसा ब्रान्ड, आयना उसी आकार में ढल जाता है जिसकों जैसा दिखना, दिखाना चाहिए। यह आयनों का खेल मेलो में लगने वाली, उल्टा-पुल्टा या हसोड़ दुनिया के नाम लोगों का मनोरंजन का माध्यम बन जाता है। 

वहीं वैचारिक आधार या उसके नाम संगठित नागरिकों का समूह राजनैतिक दल बन किसी मल्टी नेशनल क पनियों की तरह चलाया जाता है। जो संवेदन शून्य की स्थिति में संगठनात्मक व्यवस्था की छवि चमका, सतत सत्ता में बने रहने के गुर बताता है। 

ऐसे संवेदनहीन माहौल में संवेदनशील समाज का कैसे निर्माण होगा और ऐसा समाज कैसा राष्ट्र निर्माण करेगा, समझा, देखा सकता है। परिणाम सामने है, आज लेागों की आस्थायें टूट रही है सामाजिक संवेदनायें छूट रही है, आज इस असंवेदनशीलता की समाज में नई-नई मिशाले नित नये ढंग से खड़ी हो रही है, जिसे देख आम नागरिक का भयभीत होना स्वभाविक है। क्योंकि समझदार लेागों को न तो कोई संरक्षण है, न ही समाज में उनका कोई स मान इस असंवेदनशीलता के चलते रह गया है। देखा जाये तो आज दिशाहीन होते, असंवेदनशील समाज में अभिव्यक्ति की आजादी और चुप्पी का सैलाब चल पढ़ा है। जो किसी भी स य समाज और राष्ट्र के लिये घातक है।  

जबकि आज किसी भी स य समाज की पहली प्राथमिकता व्यक्ति परिवार, सुधार से शुरु होती है। जिसका पहला और अन्तिम लक्ष्य राष्ट्र होना चाहिए जो अपने नागरिकों या रहने वाले समाजों को संरक्षण, सुरक्षा, स पन्नता, खुशहाली प्रदान करता हो। क्योंकि समाज ही वह पहली यूनिट है जो मूल्य, सिद्धान्त, संस्कार, संस्कृति आधारित नागरिक का निर्माण करती है। जिससे निकलकर लोग किसी भी व्यवस्था के अहम अंग बनते है फिर चाहे वह लेाकतांत्रिक व्यवस्था ही क्यों न हो, अब समय आ गये। कि अच्छी समझ संस्कार रखने वाले देश भक्तों को सामने आना चाहिए और बगैर व्यवस्थागत सहयोग और स मान का इन्तजार किये बगैर अपने-अपने कत्र्तव्य निर्वहन में जुट चुप्पी तोडऩा चाहिए बरना वह दिन दूर नहीं, जब हम अपने घर, समाज, राष्ट्र में एक भयभीत माहौल के बीच तिल-तिल जिन्दा रहने, मरने पर मजबूर होगें फैसला आज राष्ट्र, समाज, इन्सानियत के लिये हमें ही लेना होगा तभी हम एक स य समाज और खुशहाल राष्ट्र का निर्माण कर पायेगें।  
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