पतन के दिन सुनिश्चित करने में जुटी है शेष कॉग्रेस

व्ही.एस.भुल्ले। वर्तमान हालातों के मद्देनजर शायद कॉग्रेस मुक्त भारत का सपना देखने वालो का सपना फिलहाल साकार होता दिखाई देता है। कारण बिल्कुल साफ है जब से कॉग्रेस बंधन गठबन्धन से लेकर स्वार्थियों के हाथ क्या लगी निरन्तर दिन दूनी रफ्तार से रसातल की ओर बढ़ रही है और वह क्रम आज भी निरन्तर अनवरत जारी है।

स्व. नरसिंह राव से लेकर डॉ. मनमोहन सिंह नेतृत्व चली गठबन्धन की सरकारों में कॉग्रेस के कुछ स्वार्थियों ने सत्ता सुख तो खूब भोगा और नये-नये हथकन्डों के सहारे चुनाव भी जीता, मगर संगठन निरन्तर निस्तानाबूत हो चन्द स्वार्थी नेताओं की जागिर बनता चला गया और धीरे-धीरे बिहार, उत्तरप्रदेश तो पूर्ण रुपेण जाते ही रहे। हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, म.प्र., छत्तीसगढ़ को भी गबाना पढ़ा। 

आखिर जनाधार विहीन जोड़-तोड़ में माहिर विचार विहीन स्वार्थी नेताओं के चेहरे संगठन विहीन कॉग्रेस को कब तक हवा दे पाते है। अगर लोग यह कहे कि कॉग्रेस की वर्तमान स्थिति के लिये केवल आलाकमान जि मेदार है तो यह कहना गलत होगा। क्योंकि इतने बड़े संगठन को चला पाना किसी एक दो व्यक्ति के बस की बात है और यह तब जब उसे स पूर्ण जमीनी राजनैतिक ज्ञान न हो। 

ऐसे में कांग्रेस की इस दुर्गति के लिये संचालन समितियों में मौजूद वह स्वार्थी नेता जि मेदार है जो अपने स्वार्थो के चलते तब भी चुप रहे और आज भी चुप है और आलाकमान को स्वयं को सबसे बड़े वफादार ठहरा एक नौजबान का सारा कैरियर दाव पर लगा उसे हास उपहास का माध्यम बनवाते रहते है। एक जीवट संघर्षशील युवा में आखिर ऐसी कौन सी कमी है जो कॉग्रेस में गाड़ी भरे तजुर्वे कार पूर्व मुख्यमंत्री, मंत्री स्वयं प्रधानमंत्री होने के बावजूद जब तब वह ऐसा कदम उठा जाते है जो विरोधी दल उस मुद्दे को पकड़ उन्हें उपहास का कारण बना उनका उपहास तक उड़ाते है। और वहीं नेता अहम मुद्दों पर नौजवान को ताकत देने के बजाये फिर चुप हो जाते है। 

क्या कारण है कि  आलाकमान के निर्णय आम कार्यकत्र्ता की मंशा अनुरुप नहीं हो पाते। परिणाम सामने है। 
अगर हम म.प्र. में ही कॉग्रेस का उदाहरण ले तो अभी तक कई कॉग्रेस अध्यक्ष  बदल दिये गये मगर एक भी अध्यक्ष म.प्र. में अपने पैर ठीक से नहीं जमा सका। न ही म.प्र. का कोई भी नेतृत्व, कोई ऐसी ऐतिहासिक जीत दिला सका जिस पर कॉग्रेस या आलाकमान सहित आम कॉग्रेसी गर्व कर पाता। जो कुछ जगह कॉग्रेस को जीत हासिल हो भी सकी है वह व्यक्तिगत या फिर सत्ताधारी दल के प्रति लेागों का आक्रोश हो सकता है।  न कि वह विशुद्ध कॉग्रेस की जीत  म.प्र. में कॉग्रेस के हालात यह है कि सदन का नेता कई महिनों से ग भीर बीमार है। मगर उन्हें आराम के बजाये उनसे ही काम लिया जाता है। मगर कॉग्रेस है कि उसमें बदलाव ही नहीं कर पाती। 
कॉग्रेस का दुर्भाग्य खासकर म.प्र. में यह भी है कि जिसे प्रदेश की जनता चाहती है उसे नेतृत्व नहीं मिल पाता और जिनसे प्रदेश की जनता आज भी तृस्त है उनका बोल बाला कॉग्र्रेस में देखा जाता है। फिर नेतृत्व भले ही किसी का भी हो विगत 12 वर्षो से बैवजह मुंह की खाती कॉगे्रेस अब स पूर्ण पतन के कागार पर है। 

मगर अभी भी कोई म.प्र. में अधिक्रत खेवनहार नजर नहीं आता, न ही मृत प्राय संगठन में जान फूकने वाला समझ आता। बेहतर हो राहुल छत्तीसगढ़, राजस्थान की भांति म.प्र. में भी कुछ स त निर्णय ले और म.प्र. में कॉग्रेस के पुर्नजन्म की शुरुआत करे। तभी कुछ हालत सुधर पायेगी बरना शेष पड़ी शैया पर कॉग्रेेस अन्ततोगत्वां पतन की ओर चली जायेगी। 
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