लोकतंत्र में महाराज

विलेज टाइम्स।  यूं तो वे युवराज, महाराज सिंधिया राजवंश के मुखिया होने के नाते जन्म से ही थे मगर उन्हें महाराज की जो याति लोकतांत्रिक व्यवस्था मेें प्राप्त थी वह उन्हें कोई राजवंश केे मुखिया के रुप में न होकर यह याति उन्हें आम जन के बीच प्राप्त वह स मान के कारण थी जो उनके कार्य व्यवहार पर आधारित थी। कहते है जिसको भी उन्होंने उंगली पकड़ राजनीति के ककेहरे को पडऩा सिखाया उसे उन्होंने बगैर किसी की परवाह किये, हमेशा मुकाम तक पहुंचाया। जिनकी चिन्ता उन्होंने की उन्हें भी उन्होंने दिल ही नहीं दिमाग से भी काबिल इन्सान बनाया, जिनसे चर्चा की उन्हें भी भविष्य बेहतर बनाने का गुर सिखाया क्योंकि वह बहुत भोले होने के साथ बड़े दिल के सहद्वयी इन्सान भी थे। इसलिये लेाग उन्हें दिल से महाराज कहते थे।  


कलूषित राजनीति के कहकरे से दूर, जनता के दिलो में राज करने वाले उस महाराज का हमेशा यह प्रयास रहता था कि प्रकृति और इन्सानियत एक दूसरे के पूरक बने रहे। उनका स्नेह ऐसा कि आम क्या, और खास क्या उनका जब तब आम जन या अन्तिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति के साथ स्नेह देख ले तो अच्छी-अच्छी सल्तनतों के सूरमा भी सरमा जाये। मगर उन्होंने कभी भी जीवन पर्यन्त स्थापित सिद्धान्तों से समझौता नहीं किया। 

वह हमेशा रिण माफी और धर्माधिता के मुद्दे पर स्पष्ट नजरिया जाहिर करते हुये कहते थे कि लोकतंत्र के लिये यह गलत रास्ता है मगर साधारण से साधारण व्यक्ति सत्ता सौपान तक पहुंचाने वाले इस लेाकतंत्र के महाराज का शौक नहीं दिली मंशा होती थी कि हर गरीब लेाकतंत्र में सत्ता का औपचारिक अनौपचारिक तौर पर भागीदार बने। और इन्हीं प्रयासों के बीच वह किसी शिकायत की बिना पर लोगों की सेवा करते रहे। जहां भी उन्हें कुछ करने का मौका मिला उन्होंने एक लेाकतंत्र के सिपाही के रुप में एक महाराजा की सोच के अनुसार कई ऐसे ऐतिहासिक कार्य किये। जो बामौर से लेकर सिथोली, मालनपुर, औद्योगिक क्षेत्र, शैक्षणिक संस्थाये, गुना इटावा रेल लाइन, ग्वालियर शिवपुरी हवाई अड्डा, ऑवर ब्रिज, वियजपुर फर्टिलाइजर, देश में शताब्दी टे्रनों की श्रंृखला, रेलवे स्टेशनों का आधुनिकीकरण इत्यादि ऐसे कई कार्य है। जो उन्हें लेाकतंत्र में महाराज होने का खिताब मुहैया कराते है। ऐसे ही थे कै. महाराजा श्रीमंत माधवराव सिंधिया।  
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