क्वालिटी पर कालिख कावलियत पर कोहराम.........? तीरंदाज

व्ही.एस.भुल्ले  भैया- सच बोल्यू तो हारी तो नस्ल ही नष्ट हो ली, हारा बस चले तो, मने हारी क्वालिटी पर कालिख पोतने आड़ों का मुंह नोच आऊं और...

व्ही.एस.भुल्ले 
भैया- सच बोल्यू तो हारी तो नस्ल ही नष्ट हो ली, हारा बस चले तो, मने हारी क्वालिटी पर कालिख पोतने आड़ों का मुंह नोच आऊं और हमें लेकर सड़क पर आय दिन कोहराम मचाने वालो को ऐसा सबक सिखाऊ कि उनकी सात पीढिय़ा तक कांप जाये। मगर कै करुं हारी चिडिय़ाघर, शर्कस, टाइगर सफारी संस्कृति तो हारी नस्ल की नस्ल ही निगल गई अब कहते है आपका कन्ट्रोल नहीं, अब इन्हें कौन समझाये कि वर्षो नहीं, पूरे 67 वर्ष चिडिय़ाघर, सर्कस, सफारी में शॉ पीस बनते बनते पूरी की पूरी तीन पीढिय़ां निकल ली, ऐसे में जंगल के राजा का वो दम खम कहा बचा। ऐसे में अब तो हालात यह है कि भाया खरगोश तो शिकार के नाम मुंह चिड़ा ही रहे है, अब तो मुश्किल यह है कि चूहे, लढैयां, लकड़बग्गे भी नोच तूप कर, हारा मजाक उड़ा रहे है जिसमें गिद्ध, कौओं का आतंक भले ही कम हो, अब तो गली के कुत्ते भी भौंक हमें डराने से वाज नहीं आ रहे है। 


भैये- आखिर तू कै कैड़ा चावे? 
भैया- मने कै बोल्यू जब से सर्कस, चिडिय़ाघर सफारी और जंगल में शिकारियों की धमक लेाकतंत्र के नाम हारे स्वछन्द प्रकृ़ति के बीच कै पड़ी है हारी तो जान 24 घन्टे हलक में पढ़ी है। स्वच्छन्द शिकार, मसक के खाने, सोने आराम का वक्त तो जाता ही रहा अब तो प्रकृति प्रदत्त जंगल में मन चाहा शिकार का भोजन और विचरण करने के भी लाले है। ऐसे में क्वालिटी, कत्र्तव्य, निष्ठा दिखा, प्राकृतिक धरोहर जंगल को कैसे बचाये, सुना है आज कल कंक्रीट के जंगलों में भी ऐसा ही कुछ कोहराम मचा है। लेाकतंत्र के नाम सड़कों पर बल्बा कटा पड़ा है। अब तो भाई लेाग न तो घरों में सुरक्षित है, न ही झोपड़ी और महलो में, चाहुंओर सभी में दहशत का नजारा पसरा पड़ा है।  
भैये- हारे महान लेाकतंत्र में आखिर ऐसा क्या हुआ है? जो तू अर्र-बर्र बके जा रहा है, कै थारे को मालूम कोणी हारे महान लेाकतंत्र को चलाने, कानून नीति बनाने वाली विधायिका है, कानून नीति का पालन अक्षरश: हो उसके लिये गाड़ी भरी लाल, नीली, पीली बत्तियों का संसाधनों से सुसंस्जित कारबां खड़ा है। कार्यपालिका में गड़बड़ न हो, उसके लिये माननीय न्यायालय का न्याय चल रहा है, और लेाकतंत्र को मजबूती प्रदान करने वाली मीडिया का मय अंड्डी बच्चे के कुनवा लगा है। फिर भी तने हारे महान लेाकतंत्र पर सवाल खड़े कर रहा है। मुये क्यों तने हारे महान लोकतंत्र को लेकर मजाक कर रहा है। कै थारे को मालूम कोणी लेाकतंत्र में जनता राजा भगवान और विधायिका, कार्यपालिका सेवक के रुप में होते है, जिसमें प्रधान सेवक से लेकर मु य सेवक, उपसेवक बाकी सेवा, सेवकों के ओहदो से हारे कानून की समुची किताब पटी पढ़ी है। फिर लेाकतंत्र के चौथे स्त भ के रुप में भी तो हारी महान मीडिया मुस्तैद खड़ी है। 
भैया- तने मने न बता, कै लेाकतंत्र कै होवे। मने जाड़ू थारे जैसे हारे महान लोकतंत्र को, जब से थारे लोकतंत्र की हनक हारे जंगल पहुंची है। तब से न जंगल बचे, न जंगल के राजा शेर, अब तो उनके भी अस्तित्व के लाले है। जंगल से इतर अब तो उन्हें भी खुले जंगल छोड़, वह भी टाइगर सफारी के आदि है। जिसकेे  चलते समुची जंगल व्यवस्था चौपट हो गई और अब तो जंगलों की सत्ता भी लड़ेया, लकड़बग्गे, गीदड़ों की फौज के धमाचौकड़ी का अड्डा हो गई। 
भैये- मगर इन जंगल के जानवरों से हम कांक्रीट के जंगल वालो का क्या लेना देना, हम तो अपनो को सुरक्षित कर उन्हें भी संरक्षित कर रहे है। लेाकतंत्र को महान तो जंगलो को संरक्षित कर प्रकृति की रक्षा कर रहे है। 
भैया- मने जाडू़ थारे जैसे चित्रकार-पत्रकारों को, अगर थारी बात सो आड़े सच है तो बता लेाकतंत्र में शेर कहे जाने वालो की जमात सड़क पर होते हुये भी सरेयाम लूटपाट, बलात्कार, बल्वा, आगजनी, हुड़दंग पर क्यों मूकदर्शक बन यह अराजकता झेल रही है। क्यों तुम शेरों की मण्डली सड़कों पर हुड़दंगियों के हाथों कुट रही है। जितने अधिकार इन हुड़दंगियों को इस लेाकतंत्र में है, उससे कहीं अधिक कानून की किताब मेें कत्र्तव्य, अधिकार तु हें भी तो लेाकतंत्र ने दिये है। मगर लगता है जंगल के शेरो की भी भांति सर्कस, चिडिय़ाघर, सफारी में रहते-रहते आपका भी मूल स्वभाव इस लेाकतंत्र में जाता रहा। बरना क्या कारण है कि संवैधानिक संरक्षण और पर्याप्त संसाधनों के बीच चन्द गुन्डे सड़कों पर चाहे जब कोहराम मचा देते है। जो हाथो हाथ बच्चे, महिला, बुजुर्ग, सरकारी स पत्ति को तोड़ आग के हवाले कर,  लेाकतंत्र के शेरो को मुुंह चिड़ाते है। बरना शेरो के बारे कहावत है कि शेरो की दहाड़ भर से कि.मीटरो दूर तक अच्छे अच्छों के दम निकल जाते है। फिर ये चन्द गुन्डे किस खेत की मूली है। 
भैये- चुप कर गर किसी ने सुन लिया तो शेर का स्वभाविक नेचर तो दूर, स्वयं स्वार्थ में डूबे स्वार्थियों का, जमीर तो नहीं जग पायेगा मने डर यह है, कि अगर थारा यहीं स्टंण्ड शेरो के संरक्षण को लेकर रहा तो, गुन्डो का झुन्ड तने भी अवश्य, सफारी में, भूखेे मर रहे, शेरो के बीच फैक आयेगा। तब भाया न तो थारा जंगल सिद्धान्त बचेगा, न ही कांक्रीट के जंगल में कोई थारी पुकार सुनेगा। 
भैया- मने समझ लिया जंगल और कांक्रीट के जंगलों के संरक्षण की कहानी को, सो मने भी अब समय और मौका देख शेरों के शिकार का मोर्चा लगाऊंगा और नया चिडिय़ाघर बना, तेन्दुये, बाघ ही नहीं, अब तो बबर शेर देखने की शुरुआत कराऊंगा, इतने पर तो चल जायेगी और 2018 में हारी सरकार भी लड़ैया, खरगोश, चीतल, हिरण, नीलगाय, लकड़बग्गों की मदद से पशु-पक्षियों को आश्वासन दे, इन सभी की मूक सहमति की मदद से, किसी न किसी जंगल में अवश्य बन जायेगी। 

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तीरंदाज,328,व्ही.एस.भुल्ले,523,
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क्वालिटी पर कालिख कावलियत पर कोहराम.........? तीरंदाज
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