दलो को धैर्य और सरकार को कर्तव्य निभाने की जरुरत

व्ही.एस.भुल्ले। किसी ने सपने में भी न सोचा होगा कि राजनीति में वोटो का तुष्टीकरण और व्यक्तिगत स्वार्थ हमें कहा ले जाकर छोड़ेगें 25 वर्ष के ल बे अन्तराल के बाद देश की राजनीति और उसके दल आज जिस मुकाम तक जा पहुंचे है। वह दिल को झझकोरने वाले तथा मजबूत लेाकतंत्र के लिये अशुभ संकेत है। 


जिस देश में हम रहते है, जिस देश को  हम अपना राष्ट्र कहते है ऐसे संरक्षक राष्ट्र के विरुद्ध, राष्ट्र भक्तों के बीच चन्द सरफिरे लेाग नारे लगाते है और देश की राजनीति उबल पड़ती है। और पक्ष-विपक्ष आमने-सामने हो, अपने राजनैतिक द्वेष मिटाने अपनी-अपनी ताकत झोकने में लग जाते है। 

वहीं दूसरी ओर कभी गुजरात, तो कभी राजस्थान, तो अब हरियाणा में अचानक आन्दोलन उग्र हो, सारी मर्यदायें तोड़ मंत्री तक का घर फंूक आतेे है। मात्र चन्द दिनों में ही सेना बुलानी पढ़ती है। आखिर हमारे देश में चन्द दिन या कुछ घन्टो में ऐसा क्या तूफान आ जाता है कि लेाग इतने आक्रोशित हो जाते है कि अपने ही गांव, शहर व देश की स पत्ति की तोड़ फोड़, आगजनी और लेागों की जिन्दगी असामन्य बना, हिंसा पर उतर आते है। और मीडिया मर्म को समझे बगैर उसे सुर्खियों बना लेते है। 

क्या कभी देश की महान मीडिया में इस बात पर संज्ञान लिया गया कि अगर कोई नागरिक परेशान, हैरान हो मारा जाता है तो वह गरीब ही नहीं, किसी का बेटा, पति, पुत्र, भाई होता है। जो स पत्ति आग के हवाले की जाती है वह किसी के गाढ़े पसीने की कमाई और उसके जीवोत्पार्जन का माध्यम होती है। इतना ही नहीं वह स पत्ति राष्ट्र का नागरिक होने के नाते वह, उसकी भी होती है। जिसे सरकार जनता से प्राप्त टेक्स माध्यम से तैयार कर लेाक उपयोगी सेवाओं के लिये निर्माण करती है। ऐसे में सरकार द्वारा की गई कार्यवाही में हिंसा, तोड़-फोड़ करने वाले, जेल में डाले जाते है तो वह भी किसी के भाई पिता, पुत्र, पति होते है। क्योंकि हिंसक लेाग अपना काम करते है और व्यवस्था अपना काम करती है। मगर इस बीच दोनों ही तरफ से जनता पिसती है। और वह देश, राज्य, शहर, गांव बदहाल होता है जहां यह दोनों ही अपना जीवन व्यतीत करते है। 

अगर इस तरह की खबर दिखा टी.आर.पी. बड़ा मोटा पैसा बनाने वाले मीडिया हाउस अगर मीडिया पर इतने हावी है और यह कटु सच है तो इससे बेहतर हो किसी विधा का नाम बदनाम किये बगैर ऐसे मीडिया कर्मी किसी दूसरे कार्य में जुट जाये। नहीं तो ऐसे मीडिया हाउस और वो मीडिया तैयार रहे उस दिन के लिये जब फोटो में चमकने टी.व्ही. में दिखने देश व देश के लेागों से दुराग्रह कर रहे वह हिंसक लेाग अज्ञानता बस एक सरकार के मंत्री के घर और सार्वजनिक व्यक्तिगत स पत्ति की तरह मीडिया को भी अपने निशाने पर लेने से न चूके। ऐसे हिंसक लेाग या हिंसा किसी की नहीं होती, जो अपने गांव, शहर, प्रदेश, देश के नहीं हुये, वे न किसी मंत्री, संत्री और न ही उन मीडिया हाउस, मीडिया वालो के होने वाले, जो अपने गांव, शहर, प्रदेश, देश को छोड़ क्षणिक स्वार्थ के चलते, विकास की गति को रोक हिंसक माहौल पैदा कर, देश को कमजोर कर रहे है। 

जिन्हें न तो कभी, वह गांव शहर जहां वह पले बड़े, न ही वह समाज जिसने तालीम दी और न ही वह देश जिसने एक संरक्षक के रुप में उन्हें संरक्षण दिया। कभी माफ करेगा, ऐसे में हर भारत के नागरिक का ही नहीं, राजनैतिक दल, सरकार, नौकरशाह, मीडिया को सोचना चाहिए कि देश, गांव, शहर के लिये  क्या गलत, क्या सही है, बेहतर हो, देश वासी, हिंसा के खिलाफ महात्मा गांधी जी की तरह असहयोग आन्दोलन के सत्याग्रही की तरह कार्य करे। फिर चाहे वह राजनैतिक दल, नेता, नौकरशाह, मीडिया हो या फिर देश का कोई भी नागरिक, देश से हिंसा को उखाड़ फेकने असहयोग और सत्याग्रह से बड़ा और कोई रास्ता नहीं हो सकता। क्योंकि असहयोग, सत्याग्रह लेाकतंत्र में एकता अखण्डता मजबूत बनाये रखने का वो अहिंसक अस्त्र है जिनके सहारे प्रकृति कई बार उलट, पुलट होने के बावजूद आज भी मौजूद है। वहीें बड़े- बड़े बलशाली, अहंकार स्वार्थियों का नाम लेवा पानी देवा तक आज दुनिया में मौजूद नहीं। 

क्योकि प्रकृति पूर्ण निष्ठा से अपने कत्र्तव्य अहिंसा असहयोग सत्याग्रह का पालन करती है बगैर हिंसा किये, प्राकृतिक न्याय के सिद्धान्त का पालन करती है, जिसकी अपेक्षा वह खुशहाल जीवन व्यतीत करने की इच्छा रखने वालो से भी रखती है। 
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